chevron_left उद्योग पर्व अध्याय ५२
धृतराष्ट्र उवाच:
यथैव पाण्डवाः सर्वे पराक्रान्ता जिगीषवः |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तथैवाभिसरास्तेषां त्यक्तात्मानो जय़े धृताः ||
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
त्वमेव हि पराक्रान्तानाचक्षीथाः परान्मम |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पाञ्चालान्केकय़ान्मत्स्यान्मागधान्वत्सभूमिपान् ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यश्च सेन्द्रानिमाँल्लोकानिच्छन्कुर्याद्वशे वली |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स श्रेष्ठो जगतः कृष्णः पाण्डवानां जय़े धृतः ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
समस्तामर्जुनाद्विद्यां सात्यकिः क्षिप्रमाप्तवान् |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
शैनेय़ः समरे स्थाता वीजवत्प्रवपञ्शरान् ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
धृष्टद्युम्नश्च पाञ्चाल्यः क्रूरकर्मा महारथः |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मामकेषु रणं कर्ता वलेषु परमास्त्रवित् ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
युधिष्ठिरस्य च क्रोधादर्जुनस्य च विक्रमात् |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यमाभ्यां भीमसेनाच्च भय़ं मे तात जाय़ते ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अमानुषं मनुष्येन्द्रैर्जालं विततमन्तरा |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मम सेनां हनिष्यन्ति ततः क्रोशामि सञ्जय़ ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
दर्शनीय़ो मनस्वी च लक्ष्मीवान्व्रह्मवर्चसी |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मेधावी सुकृतप्रज्ञो धर्मात्मा पाण्डुनन्दनः ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मित्रामात्यैः सुसम्पन्नः सम्पन्नो योज्ययोजकैः |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
भ्रातृभिः श्वशुरैः पुत्रैरुपपन्नो महारथैः ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
धृत्या च पुरुषव्याघ्रो नैभृत्येन च पाण्डवः |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
अनृशंसो वदान्यश्च ह्रीमान्सत्यपराक्रमः ||
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वहुश्रुतः कृतात्मा च वृद्धसेवी जितेन्द्रिय़ः |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तं सर्वगुणसम्पन्नं समिद्धमिव पावकम् ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तपन्तमिव को मन्दः पतिष्यति पतङ्गवत् |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पाण्डवाग्निमनावार्यं मुमूर्षुर्मूढचेतनः ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तनुरुच्चः शिखी राजा शुद्धजाम्वूनदप्रभः |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनान्तं करिष्यति ||
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तैरय़ुद्धं साधु मन्ये कुरवस्तन्निवोधत |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
युद्धे विनाशः कृत्स्नस्य कुलस्य भविता ध्रुवम् ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
एषा मे परमा शान्तिर्यया शाम्यति मे मनः |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यदि त्वय़ुद्धमिष्टं वो वय़ं शान्त्यै यतामहे ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न तु नः शिक्षमाणानामुपेक्षेत युधिष्ठिरः |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
जुगुप्सति ह्यधर्मेण मामेवोद्दिश्य कारणम् ||
१६ ख