chevron_left शल्य पर्व अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच:
शृणु मातृगणान्राजन्कुमारानुचरानिमान् |
१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
कीर्त्यमानान्मय़ा वीर सपत्नगणसूदनान् ||
१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
यशस्विनीनां मातॄणां शृणु नामानि भारत |
२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
याभिर्व्याप्तास्त्रय़ो लोकाः कल्याणीभिश्चराचराः ||
२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रभावती विशालाक्षी पलिता गोनसी तथा |
३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
श्रीमती वहुला चैव तथैव वहुपुत्रिका ||
३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
अप्सुजाता च गोपाली वृहदम्वालिका तथा |
४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
जय़ावती मालतिका ध्रुवरत्ना भय़ङ्करी ||
४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
वसुदामा सुदामा च विशोका नन्दिनी तथा |
५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
एकचूडा महाचूडा चक्रनेमिश्च भारत ||
५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
उत्तेजनी जय़त्सेना कमलाक्ष्यथ शोभना |
६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
शत्रुञ्जय़ा तथा चैव क्रोधना शलभी खरी ||
६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
माधवी शुभवक्त्रा च तीर्थनेमिश्च भारत |
७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
गीतप्रिय़ा च कल्याणी कद्रुला चामिताशना ||
७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
मेघस्वना भोगवती सुभ्रूश्च कनकावती |
८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
अलाताक्षी वीर्यवती विद्युज्जिह्वा च भारत ||
८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
पद्मावती सुनक्षत्रा कन्दरा वहुय़ोजना |
९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सन्तानिका च कौरव्य कमला च महावला ||
९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सुदामा वहुदामा च सुप्रभा च यशस्विनी |
१० क
वैशम्पाय़न उवाच:
नृत्यप्रिय़ा च राजेन्द्र शतोलूखलमेखला ||
१० ख
वैशम्पाय़न उवाच:
शतघण्टा शतानन्दा भगनन्दा च भामिनी |
११ क
वैशम्पाय़न उवाच:
वपुष्मती चन्द्रशीता भद्रकाली च भारत ||
११ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
सङ्कारिका निष्कुटिका भ्रमा चत्वरवासिनी |
१२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सुमङ्गला स्वस्तिमती वृद्धिकामा जय़प्रिय़ा ||
१२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
धनदा सुप्रसादा च भवदा च जलेश्वरी |
१३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
एडी भेडी समेडी च वेतालजननी तथा |
१३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
कण्डूतिः कालिका चैव देवमित्रा च भारत ||
१३ ग
वैशम्पाय़न उवाच:
लम्वसी केतकी चैव चित्रसेना तथा वला |
१४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
कुक्कुटिका शङ्खनिका तथा जर्जरिका नृप ||
१४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
कुण्डारिका कोकलिका कण्डरा च शतोदरी |
१५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
उत्क्राथिनी जरेणा च महावेगा च कङ्कणा ||
१५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
मनोजवा कण्टकिनी प्रघसा पूतना तथा |
१६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
खशय़ा चुर्व्युटिर्वामा क्रोशनाथ तडित्प्रभा ||
१६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
मण्डोदरी च तुण्डा च कोटरा मेघवासिनी |
१७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
सुभगा लम्विनी लम्वा वसुचूडा विकत्थनी ||
१७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ऊर्ध्ववेणीधरा चैव पिङ्गाक्षी लोहमेखला |
१८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
पृथुवक्त्रा मधुरिका मधुकुम्भा तथैव च ||
१८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
पक्षालिका मन्थनिका जराय़ुर्जर्जरानना |
१९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
ख्याता दहदहा चैव तथा धमधमा नृप ||
१९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
खण्डखण्डा च राजेन्द्र पूषणा मणिकुण्डला |
२० क
वैशम्पाय़न उवाच:
अमोचा चैव कौरव्य तथा लम्वपय़ोधरा ||
२० ख
वैशम्पाय़न उवाच:
वेणुवीणाधरा चैव पिङ्गाक्षी लोहमेखला |
२१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
शशोलूकमुखी कृष्णा खरजङ्घा महाजवा ||
२१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
शिशुमारमुखी श्वेता लोहिताक्षी विभीषणा |
२२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
जटालिका कामचरी दीर्घजिह्वा वलोत्कटा ||
२२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
कालेडिका वामनिका मुकुटा चैव भारत |
२३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
लोहिताक्षी महाकाय़ा हरिपिण्डी च भूमिप ||
२३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एकाक्षरा सुकुसुमा कृष्णकर्णी च भारत |
२४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
क्षुरकर्णी चतुष्कर्णी कर्णप्रावरणा तथा ||
२४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
चतुष्पथनिकेता च गोकर्णी महिषानना |
२५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
खरकर्णी महाकर्णी भेरीस्वनमहास्वना ||
२५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
शङ्खकुम्भस्वना चैव भङ्गदा च महावला |
२६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
गणा च सुगणा चैव तथाभीत्यथ कामदा ||
२६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
चतुष्पथरता चैव भूतितीर्थान्यगोचरा |
२७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
पशुदा वित्तदा चैव सुखदा च महाय़शाः |
२७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
पय़ोदा गोमहिषदा सुविषाणा च भारत ||
२७ ग
वैशम्पाय़न उवाच:
प्रतिष्ठा सुप्रतिष्ठा च रोचमाना सुरोचना |
२८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
गोकर्णी च सुकर्णी च ससिरा स्थेरिका तथा |
२८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एकचक्रा मेघरवा मेघमाला विरोचना ||
२८ ग
वैशम्पाय़न उवाच:
एताश्चान्याश्च वहवो मातरो भरतर्षभ |
२९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
कार्त्तिकेय़ानुय़ाय़िन्यो नानारूपाः सहस्रशः ||
२९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
दीर्घनख्यो दीर्घदन्त्यो दीर्घतुण्ड्यश्च भारत |
३० क
वैशम्पाय़न उवाच:
सरला मधुराश्चैव यौवनस्थाः स्वलङ्कृताः ||
३० ख
वैशम्पाय़न उवाच:
माहात्म्येन च संय़ुक्ताः कामरूपधरास्तथा |
३१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
निर्मांसगात्र्यः श्वेताश्च तथा काञ्चनसंनिभाः ||
३१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
कृष्णमेघनिभाश्चान्या धूम्राश्च भरतर्षभ |
३२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
अरुणाभा महाभागा दीर्घकेश्यः सिताम्वराः ||
३२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ऊर्ध्ववेणीधराश्चैव पिङ्गाक्ष्यो लम्वमेखलाः |
३३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
लम्वोदर्यो लम्वकर्णास्तथा लम्वपय़ोधराः ||
३३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ताम्राक्ष्यस्ताम्रवर्णाश्च हर्यक्ष्यश्च तथापराः |
३४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
वरदाः कामचारिण्यो नित्यप्रमुदितास्तथा ||
३४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
याम्यो रौद्र्यस्तथा सौम्याः कौवेर्योऽथ महावलाः |
३५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
वारुण्योऽथ च माहेन्द्र्यस्तथाग्नेय़्यः परन्तप ||
३५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
वाय़व्यश्चाथ कौमार्यो व्राह्म्यश्च भरतर्षभ |
३६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
रूपेणाप्सरसां तुल्या जवे वाय़ुसमास्तथा ||
३६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
परपुष्टोपमा वाक्ये तथर्द्ध्या धनदोपमाः |
३७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
शक्रवीर्योपमाश्चैव दीप्त्या वह्निसमास्तथा ||
३७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
वृक्षचत्वरवासिन्यश्चतुष्पथनिकेतनाः |
३८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
गुहाश्मशानवासिन्यः शैलप्रस्रवणालय़ाः ||
३८ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
नानाभरणधारिण्यो नानामाल्याम्वरास्तथा |
३९ क
वैशम्पाय़न उवाच:
नानाविचित्रवेषाश्च नानाभाषास्तथैव च ||
३९ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
एते चान्ये च वहवो गणाः शत्रुभय़ङ्कराः |
४० क
वैशम्पाय़न उवाच:
अनुजग्मुर्महात्मानं त्रिदशेन्द्रस्य संमते ||
४० ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ततः शक्त्यस्त्रमददद्भगवान्पाकशासनः |
४१ क
वैशम्पाय़न उवाच:
गुहाय़ राजशार्दूल विनाशाय़ सुरद्विषाम् ||
४१ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
महास्वनां महाघण्टां द्योतमानां सितप्रभाम् |
४२ क
वैशम्पाय़न उवाच:
तरुणादित्यवर्णां च पताकां भरतर्षभ ||
४२ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
ददौ पशुपतिस्तस्मै सर्वभूतमहाचमूम् |
४३ क
वैशम्पाय़न उवाच:
उग्रां नानाप्रहरणां तपोवीर्यवलान्विताम् ||
४३ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
विष्णुर्ददौ वैजय़न्तीं मालां वलविवर्धिनीम् |
४४ क
वैशम्पाय़न उवाच:
उमा ददौ चारजसी वाससी सूर्यसप्रभे ||
४४ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
गङ्गा कमण्डलुं दिव्यममृतोद्भवमुत्तमम् |
४५ क
वैशम्पाय़न उवाच:
ददौ प्रीत्या कुमाराय़ दण्डं चैव वृहस्पतिः ||
४५ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
गरुडो दय़ितं पुत्रं मय़ूरं चित्रवर्हिणम् |
४६ क
वैशम्पाय़न उवाच:
अरुणस्ताम्रचूडं च प्रददौ चरणाय़ुधम् ||
४६ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
पाशं तु वरुणो राजा वलवीर्यसमन्वितम् |
४७ क
वैशम्पाय़न उवाच:
कृष्णाजिनं तथा व्रह्मा व्रह्मण्याय़ ददौ प्रभुः |
४७ ख
वैशम्पाय़न उवाच:
समरेषु जय़ं चैव प्रददौ लोकभावनः ||
४७ ग
वैशम्पाय़न उवाच:
सेनापत्यमनुप्राप्य स्कन्दो देवगणस्य ह |
४८ क
वैशम्पाय़न उवाच:
शुशुभे ज्वलितोऽर्चिष्मान्द्वितीय़ इव पावकः |
४८ ख