भीष्म उवाच:
इष्टानिष्टविय़ुक्तं हि तस्थौ व्रह्म परात्परम् |
९८ ख
भीष्म उवाच:
नित्यं तमाहुर्विद्वांसः शुचिस्तस्माच्छुचिर्भव ||
९८ ग
भीष्म उवाच:
दीय़ते यच्च लभते दत्तं यच्चानुमन्यते |
९९ क
भीष्म उवाच:
ददाति च नरश्रेष्ठ प्रतिगृह्णाति यच्च ह |
९९ ख
भीष्म उवाच:
ददात्यव्यक्तमेवैतत्प्रतिगृह्णाति तच्च वै ||
९९ ग
भीष्म उवाच:
आत्मा ह्येवात्मनो ह्येकः कोऽन्यस्त्वत्तोऽधिको भवेत् |
१०० क
भीष्म उवाच:
एवं मन्यस्व सततमन्यथा मा विचिन्तय़ ||
१०० ख
भीष्म उवाच:
यस्याव्यक्तं न विदितं सगुणं निर्गुणं पुनः |
१०१ क
भीष्म उवाच:
तेन तीर्थानि यज्ञाश्च सेवितव्याविपश्चिता ||
१०१ ख
भीष्म उवाच:
न स्वाध्याय़ैस्तपोभिर्वा यज्ञैर्वा कुरुनन्दन |
१०२ क
भीष्म उवाच:
लभतेऽव्यक्तसंस्थानं ज्ञात्वाव्यक्तं महीपते ||
१०२ ख
भीष्म उवाच:
तथैव महतः स्थानमाहङ्कारिकमेव च |
१०३ क
भीष्म उवाच:
अहङ्कारात्परं चापि स्थानानि समवाप्नुय़ात् ||
१०३ ख
भीष्म उवाच:
ये त्वव्यक्तात्परं नित्यं जानते शास्त्रतत्पराः |
१०४ क
भीष्म उवाच:
जन्ममृत्युविय़ुक्तं च विय़ुक्तं सदसच्च यत् ||
१०४ ख
भीष्म उवाच:
एतन्मय़ाप्तं जनकात्पुरस्ता; त्तेनापि चाप्तं नृप याज्ञवल्क्यात् |
१०५ क
भीष्म उवाच:
ज्ञानं विशिष्टं न तथा हि यज्ञा; ज्ञानेन दुर्गं तरते न यज्ञैः ||
१०५ ख
भीष्म उवाच:
दुर्गं जन्म निधनं चापि राज; न्न भूतिकं ज्ञानविदो वदन्ति |
१०६ क
भीष्म उवाच:
यज्ञैस्तपोभिर्निय़मैर्व्रतैश्च; दिवं समासाद्य पतन्ति भूमौ ||
१०६ ख
भीष्म उवाच:
तस्मादुपासस्व परं महच्छुचि; शिवं विमोक्षं विमलं पवित्रम् |
१०७ क
भीष्म उवाच:
क्षेत्रज्ञवित्पार्थिव ज्ञानय़ज्ञ; मुपास्य वै तत्त्वमृषिर्भविष्यसि ||
१०७ ख
भीष्म उवाच:
उपनिषदमुपाकरोत्तदा वै; जनकनृपस्य पुरा हि याज्ञवल्क्यः |
१०८ क
भीष्म उवाच:
यदुपगणितशाश्वताव्ययं त; च्छुभममृतत्वमशोकमृच्छतीति ||
१०८ ख