सूत उवाच:
अथाश्वाद्धम्यमानात्सर्वस्रोतोभ्यः सधूमा अर्चिषोऽग्नेर्निष्पेतुः ||
१५७ ख
सूत उवाच:
ताभिर्नागलोको धूपितः ||
१५८ क
सूत उवाच:
अथ ससम्भ्रमस्तक्षकोऽग्नितेजोभय़विषण्णस्ते कुण्डले गृहीत्वा सहसा स्वभवनान्निष्क्रम्योत्तङ्कमुवाच |
१५९ क
सूत उवाच:
एते कुण्डले प्रतिगृह्णातु भवानिति ||
१५९ ख
सूत उवाच:
स ते प्रतिजग्राहोत्तङ्कः |
१६० क
सूत उवाच:
कुण्डले प्रतिगृह्याचिन्तय़त् |
१६० ख
सूत उवाच:
अद्य तत्पुण्यकमुपाध्याय़िन्याः |
१६० ग
सूत उवाच:
दूरं चाहमभ्यागतः |
१६० घ
सूत उवाच:
कथं नु खलु सम्भावय़ेय़मिति ||
१६० 5
सूत उवाच:
तत एनं चिन्तय़ानमेव स पुरुष उवाच |
१६१ क
सूत उवाच:
उत्तङ्क एनमश्वमधिरोह |
१६१ ख
सूत उवाच:
एष त्वां क्षणादेवोपाध्याय़कुलं प्रापय़िष्यतीति ||
१६१ ग
सूत उवाच:
स तथेत्युक्त्वा तमश्वमधिरुह्य प्रत्याजगामोपाध्याय़कुलम् |
१६२ क
सूत उवाच:
उपाध्याय़िनी च स्नाता केशानावपय़न्त्युपविष्टोत्तङ्को नागच्छतीति शापाय़ास्य मनो दधे ||
१६२ ख
सूत उवाच:
अथोत्तङ्कः प्रविश्य उपाध्याय़िनीमभ्यवादय़त् |
१६३ क
सूत उवाच:
ते चास्यै कुण्डले प्राय़च्छत् ||
१६३ ख
सूत उवाच:
सा चैनं प्रत्युवाच |
१६४ क
सूत उवाच:
उत्तङ्क देशे कालेऽभ्यागतः |
१६४ ख
सूत उवाच:
स्वागतं ते वत्स |
१६४ ग
सूत उवाच:
मनागसि मय़ा न शप्तः |
१६४ घ
सूत उवाच:
श्रेय़स्तवोपस्थितम् |
१६४ 5
सूत उवाच:
सिद्धिमाप्नुहीति ||
१६४ 6
सूत उवाच:
अथोत्तङ्क उपाध्याय़मभ्यवादय़त् |
१६५ क
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
१६५ ख
सूत उवाच:
वत्सोत्तङ्क स्वागतं ते |
१६५ ग
सूत उवाच:
किं चिरं कृतमिति ||
१६५ घ
सूत उवाच:
तमुत्तङ्क उपाध्याय़ं प्रत्युवाच |
१६६ क
सूत उवाच:
भोस्तक्षकेण नागराजेन विघ्नः कृतोऽस्मिन्कर्मणि |
१६६ ख
सूत उवाच:
तेनास्मि नागलोकं नीतः ||
१६६ ग
सूत उवाच:
तत्र च मय़ा दृष्टे स्त्रिय़ौ तन्त्रेऽधिरोप्य पटं वय़न्त्यौ |
१६७ क
सूत उवाच:
तस्मिंश्च तन्त्रे कृष्णाः सिताश्च तन्तवः |
१६७ ख
सूत उवाच:
किं तत् ||
१६७ ग
सूत उवाच:
तत्र च मय़ा चक्रं दृष्टं द्वादशारम् |
१६८ क
सूत उवाच:
षट्चैनं कुमाराः परिवर्तय़न्ति |
१६८ ख
सूत उवाच:
तदपि किम् ||
१६८ ग
सूत उवाच:
पुरुषश्चापि मय़ा दृष्टः |
१६९ क
सूत उवाच:
स पुनः कः ||
१६९ ख
सूत उवाच:
अश्वश्चातिप्रमाणय़ुक्तः |
१७० क
सूत उवाच:
स चापि कः ||
१७० ख
सूत उवाच:
पथि गच्छता मय़ा ऋषभो दृष्टः |
१७१ क
सूत उवाच:
तं च पुरुषोऽधिरूढः |
१७१ ख
सूत उवाच:
तेनास्मि सोपचारमुक्तः |
१७१ ग
सूत उवाच:
उत्तङ्कास्य ऋषभस्य पुरीषं भक्षय़ |
१७१ घ
सूत उवाच:
उपाध्याय़ेनापि ते भक्षितमिति |
१७१ 5
सूत उवाच:
ततस्तद्वचनान्मय़ा तदृषभस्य पुरीषमुपय़ुक्तम् |
१७१ 6
सूत उवाच:
तदिच्छामि भवतोपदिष्टं किं तदिति ||
१७१ 7
सूत उवाच:
तेनैवमुक्त उपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
१७२ क
सूत उवाच:
ये ते स्त्रिय़ौ धाता विधाता च |
१७२ ख
सूत उवाच:
ये च ते कृष्णाः सिताश्च तन्तवस्ते रात्र्यहनी ||
१७२ ग
सूत उवाच:
यदपि तच्चक्रं द्वादशारं षट्कुमाराः परिवर्तय़न्ति ते ऋतवः षट्संवत्सरश्चक्रम् |
१७३ क
सूत उवाच:
यः पुरुषः स पर्जन्यः |
१७३ ख
सूत उवाच:
योऽश्वः सोऽग्निः ||
१७३ ग
सूत उवाच:
य ऋषभस्त्वय़ा पथि गच्छता दृष्टः स ऐरावतो नागराजः |
१७४ क
सूत उवाच:
यश्चैनमधिरूढः स इन्द्रः |
१७४ ख
सूत उवाच:
यदपि ते पुरीषं भक्षितं तस्य ऋषभस्य तदमृतम् ||
१७४ ग
सूत उवाच:
तेन खल्वसि न व्यापन्नस्तस्मिन्नागभवने |
१७५ क
सूत उवाच:
स चापि मम सखा इन्द्रः ||
१७५ ख
सूत उवाच:
तदनुग्रहात्कुण्डले गृहीत्वा पुनरभ्यागतोऽसि |
१७६ क
सूत उवाच:
तत्सौम्य गम्यताम् |
१७६ ख
सूत उवाच:
अनुजाने भवन्तम् |
१७६ ग
सूत उवाच:
श्रेय़ोऽवाप्स्यसीति ||
१७६ घ
सूत उवाच:
स उपाध्याय़ेनानुज्ञात उत्तङ्कः क्रुद्धस्तक्षकस्य प्रतिचिकीर्षमाणो हास्तिनपुरं प्रतस्थे ||
१७७ क
सूत उवाच:
स हास्तिनपुरं प्राप्य नचिराद्द्विजसत्तमः |
१७८ क
सूत उवाच:
समागच्छत राजानमुत्तङ्को जनमेजय़म् ||
१७८ ख
सूत उवाच:
पुरा तक्षशिलातस्तं निवृत्तमपराजितम् |
१७९ क
सूत उवाच:
सम्यग्विजय़िनं दृष्ट्वा समन्तान्मन्त्रिभिर्वृतम् ||
१७९ ख
सूत उवाच:
तस्मै जय़ाशिषः पूर्वं यथान्याय़ं प्रय़ुज्य सः |
१८० क
सूत उवाच:
उवाचैनं वचः काले शव्दसम्पन्नय़ा गिरा ||
१८० ख
सूत उवाच:
अन्यस्मिन्करणीय़े त्वं कार्ये पार्थिवसत्तम |
१८१ क
सूत उवाच:
वाल्यादिवान्यदेव त्वं कुरुषे नृपसत्तम ||
१८१ ख
सूत उवाच:
एवमुक्तस्तु विप्रेण स राजा प्रत्युवाच ह |
१८२ क
सूत उवाच:
जनमेजय़ः प्रसन्नात्मा सम्यक्सम्पूज्य तं मुनिम् ||
१८२ ख
सूत उवाच:
आसां प्रजानां परिपालनेन; स्वं क्षत्रधर्मं परिपालय़ामि |
१८३ क
सूत उवाच:
प्रव्रूहि वा किं क्रिय़तां द्विजेन्द्र; शुश्रूषुरस्म्यद्य वचस्त्वदीय़म् ||
१८३ ख
सूत उवाच:
स एवमुक्तस्तु नृपोत्तमेन; द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्ठः |
१८४ क
सूत उवाच:
उवाच राजानमदीनसत्त्वं; स्वमेव कार्यं नृपतेश्च यत्तत् ||
१८४ ख
सूत उवाच:
तक्षकेण नरेन्द्रेन्द्र येन ते हिंसितः पिता |
१८५ क
सूत उवाच:
तस्मै प्रतिकुरुष्व त्वं पन्नगाय़ दुरात्मने ||
१८५ ख
सूत उवाच:
कार्यकालं च मन्येऽहं विधिदृष्टस्य कर्मणः |
१८६ क
सूत उवाच:
तद्गच्छापचितिं राजन्पितुस्तस्य महात्मनः ||
१८६ ख
सूत उवाच:
तेन ह्यनपराधी स दष्टो दुष्टान्तरात्मना |
१८७ क
सूत उवाच:
पञ्चत्वमगमद्राजा वज्राहत इव द्रुमः ||
१८७ ख
सूत उवाच:
वलदर्पसमुत्सिक्तस्तक्षकः पन्नगाधमः |
१८८ क
सूत उवाच:
अकार्यं कृतवान्पापो योऽदशत्पितरं तव ||
१८८ ख
सूत उवाच:
राजर्षिवंशगोप्तारममरप्रतिमं नृपम् |
१८९ क
सूत उवाच:
जघान काश्यपं चैव न्यवर्तय़त पापकृत् ||
१८९ ख
सूत उवाच:
दग्धुमर्हसि तं पापं ज्वलिते हव्यवाहने |
१९० क
सूत उवाच:
सर्पसत्रे महाराज त्वय़ि तद्धि विधीय़ते ||
१९० ख
सूत उवाच:
एवं पितुश्चापचितिं गतवांस्त्वं भविष्यसि |
१९१ क
सूत उवाच:
मम प्रिय़ं च सुमहत्कृतं राजन्भविष्यति ||
१९१ ख
सूत उवाच:
कर्मणः पृथिवीपाल मम येन दुरात्मना |
१९२ क
सूत उवाच:
विघ्नः कृतो महाराज गुर्वर्थं चरतोऽनघ ||
१९२ ख
सूत उवाच:
एतच्छ्रुत्वा तु नृपतिस्तक्षकस्य चुकोप ह |
१९३ क
सूत उवाच:
उत्तङ्कवाक्यहविषा दीप्तोऽग्निर्हविषा यथा ||
१९३ ख
सूत उवाच:
अपृच्छच्च तदा राजा मन्त्रिणः स्वान्सुदुःखितः |
१९४ क
सूत उवाच:
उत्तङ्कस्यैव सांनिध्ये पितुः स्वर्गगतिं प्रति ||
१९४ ख
सूत उवाच:
तदैव हि स राजेन्द्रो दुःखशोकाप्लुतोऽभवत् |
१९५ क
सूत उवाच:
यदैव पितरं वृत्तमुत्तङ्कादशृणोत्तदा ||
१९५ ख