chevron_left आदि पर्व अध्याय ३
सूत उवाच:
न गच्छतोपस्पृष्टं भवति न स्थितेनेति ||
११४ ग
सूत उवाच:
अथोत्तङ्कस्तथेत्युक्त्वा प्राङ्मुख उपविश्य सुप्रक्षालितपाणिपादवदनोऽशव्दाभिर् हृदय़ङ्गमाभिरद्भिरुपस्पृश्य त्रिः पीत्वा द्विः परिमृज्य खान्यद्भिरुपस्पृश्यान्तःपुरं प्रविश्य तां क्षत्रिय़ामपश्यत् ||
११५ क
सूत उवाच:
सा च दृष्ट्वैवोत्तङ्कमभ्युत्थाय़ाभिवाद्योवाच |
११६ क
सूत उवाच:
स्वागतं ते भगवन् |
११६ ख
सूत उवाच:
आज्ञापय़ किं करवाणीति ||
११६ ग
सूत उवाच:
स तामुवाच |
११७ क
सूत उवाच:
एते कुण्डले गुर्वर्थं मे भिक्षिते दातुमर्हसीति ||
११७ ख
सूत उवाच:
सा प्रीता तेन तस्य सद्भावेन पात्रमय़मनतिक्रमणीय़श्चेति मत्वा ते कुण्डले अवमुच्यास्मै प्राय़च्छत् ||
११८ क
सूत उवाच:
आह चैनम् |
११९ क
सूत उवाच:
एते कुण्डले तक्षको नागराजः प्रार्थय़ति |
११९ ख
सूत उवाच:
अप्रमत्तो नेतुमर्हसीति ||
११९ ग
सूत उवाच:
स एवमुक्तस्तां क्षत्रिय़ां प्रत्युवाच |
१२० क
सूत उवाच:
भवति सुनिर्वृता भव |
१२० ख
सूत उवाच:
न मां शक्तस्तक्षको नागराजो धर्षय़ितुमिति ||
१२० ग
सूत उवाच:
स एवमुक्त्वा तां क्षत्रिय़ामामन्त्र्य पौष्यसकाशमागच्छत् ||
१२१ क
सूत उवाच:
स तं दृष्ट्वोवाच |
१२२ क
सूत उवाच:
भोः पौष्य प्रीतोऽस्मीति ||
१२२ ख
सूत उवाच:
तं पौष्यः प्रत्युवाच |
१२३ क
सूत उवाच:
भगवंश्चिरस्य पात्रमासाद्यते |
१२३ ख
सूत उवाच:
भवांश्च गुणवानतिथिः |
१२३ ग
सूत उवाच:
तत्करिष्ये श्राद्धम् |
१२३ घ
सूत उवाच:
क्षणः क्रिय़तामिति ||
१२३ 5
सूत उवाच:
तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच |
१२४ क
सूत उवाच:
कृतक्षण एवास्मि |
१२४ ख
सूत उवाच:
शीघ्रमिच्छामि यथोपपन्नमन्नमुपहृतं भवतेति ||
१२४ ग
सूत उवाच:
स तथेत्युक्त्वा यथोपपन्नेनान्नेनैनं भोजय़ामास ||
१२५ क
सूत उवाच:
अथोत्तङ्कः शीतमन्नं सकेशं दृष्ट्वा अशुच्येतदिति मत्वा पौष्यमुवाच |
१२६ क
सूत उवाच:
यस्मान्मे अशुच्यन्नं ददासि तस्मदन्धो भविष्यसीति ||
१२६ ख
सूत उवाच:
तं पौष्यः प्रत्युवाच |
१२७ क
सूत उवाच:
यस्मात्त्वमप्यदुष्टमन्नं दूषय़सि तस्मादनपत्यो भविष्यसीति ||
१२७ ख
सूत उवाच:
सोऽथ पौष्यस्तस्याशुचिभावमन्नस्यागमय़ामास ||
१२८ क
सूत उवाच:
अथ तदन्नं मुक्तकेश्या स्त्रिय़ोपहृतं सकेशमशुचि मत्वोत्तङ्कं प्रसादय़ामास |
१२९ क
सूत उवाच:
भगवन्नज्ञानादेतदन्नं सकेशमुपहृतं शीतं च |
१२९ ख
सूत उवाच:
तत्क्षामय़े भवन्तम् |
१२९ ग
सूत उवाच:
न भवेय़मन्ध इति ||
१२९ घ
सूत उवाच:
तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच |
१३० क
सूत उवाच:
न मृषा व्रवीमि |
१३० ख
सूत उवाच:
भूत्वा त्वमन्धो नचिरादनन्धो भविष्यसीति |
१३० ग
सूत उवाच:
ममापि शापो न भवेद्भवता दत्त इति ||
१३० घ
सूत उवाच:
तं पौष्यः प्रत्युवाच |
१३१ क
सूत उवाच:
नाहं शक्तः शापं प्रत्यादातुम् |
१३१ ख
सूत उवाच:
न हि मे मन्युरद्याप्युपशमं गच्छति |
१३१ ग
सूत उवाच:
किं चैतद्भवता न ज्ञाय़ते यथा ||
१३१ घ
सूत उवाच:
नावनीतं हृदय़ं व्राह्मणस्य; वाचि क्षुरो निहितस्तीक्ष्णधारः |
१३२ क
सूत उवाच:
विपरीतमेतदुभय़ं क्षत्रिय़स्य; वाङ्नावनीती हृदय़ं तीक्ष्णधारम् ||
१३२ ख
सूत उवाच:
इति |
१३३ क
सूत उवाच:
तदेवं गते न शक्तोऽहं तीक्ष्णहृदय़त्वात्तं शापमन्यथा कर्तुम् |
१३३ ख
सूत उवाच:
गम्यतामिति ||
१३३ ग
सूत उवाच:
तमुत्तङ्कः प्रत्युवाच |
१३४ क
सूत उवाच:
भवताहमन्नस्याशुचिभावमागमय़्य प्रत्यनुनीतः |
१३४ ख
सूत उवाच:
प्राक्च तेऽभिहितम् |
१३४ ग
सूत उवाच:
यस्माददुष्टमन्नं दूषय़सि तस्मादनपत्यो भविष्यसीति |
१३४ घ
सूत उवाच:
दुष्टे चान्ने नैष मम शापो भविष्यतीति ||
१३४ 5
सूत उवाच:
साधय़ामस्तावदित्युक्त्वा प्रातिष्ठतोत्तङ्कस्ते कुण्डले गृहीत्वा ||
१३५ क
सूत उवाच:
सोऽपश्यत्पथि नग्नं श्रमणमागच्छन्तं मुहुर्मुहुर्दृश्यमानमदृश्यमानं च |
१३६ क
सूत उवाच:
अथोत्तङ्कस्ते कुण्डले भूमौ निक्षिप्योदकार्थं प्रचक्रमे ||
१३६ ख
सूत उवाच:
एतस्मिन्नन्तरे स श्रमणस्त्वरमाण उपसृत्य ते कुण्डले गृहीत्वा प्राद्रवत् |
१३७ क
सूत उवाच:
तमुत्तङ्कोऽभिसृत्य जग्राह |
१३७ ख
सूत उवाच:
स तद्रूपं विहाय़ तक्षकरूपं कृत्वा सहसा धरण्यां विवृतं महाविलं विवेश ||
१३७ ग
सूत उवाच:
प्रविश्य च नागलोकं स्वभवनमगच्छत् |
१३८ क
सूत उवाच:
तमुत्तङ्कोऽन्वाविवेश तेनैव विलेन |
१३८ ख
सूत उवाच:
प्रविश्य च नागानस्तुवदेभिः श्लोकैः ||
१३८ ग
सूत उवाच:
य ऐरावतराजानः सर्पाः समितिशोभनाः |
१३९ क
सूत उवाच:
वर्षन्त इव जीमूताः सविद्युत्पवनेरिताः ||
१३९ ख
सूत उवाच:
सुरूपाश्च विरूपाश्च तथा कल्माषकुण्डलाः |
१४० क
सूत उवाच:
आदित्यवन्नाकपृष्ठे रेजुरैरावतोद्भवाः ||
१४० ख
सूत उवाच:
वहूनि नागवर्त्मानि गङ्गाय़ास्तीर उत्तरे |
१४१ क
सूत उवाच:
इच्छेत्कोऽर्कांशुसेनाय़ां चर्तुमैरावतं विना ||
१४१ ख
सूत उवाच:
शतान्यशीतिरष्टौ च सहस्राणि च विंशतिः |
१४२ क
सूत उवाच:
सर्पाणां प्रग्रहा यान्ति धृतराष्ट्रो यदेजति ||
१४२ ख
सूत उवाच:
ये चैनमुपसर्पन्ति ये च दूरं परं गताः |
१४३ क
सूत उवाच:
अहमैरावतज्येष्ठभ्रातृभ्योऽकरवं नमः ||
१४३ ख
सूत उवाच:
यस्य वासः कुरुक्षेत्रे खाण्डवे चाभवत्सदा |
१४४ क
सूत उवाच:
तं काद्रवेय़मस्तौषं कुण्डलार्थाय़ तक्षकम् ||
१४४ ख
सूत उवाच:
तक्षकश्चाश्वसेनश्च नित्यं सहचरावुभौ |
१४५ क
सूत उवाच:
कुरुक्षेत्रे निवसतां नदीमिक्षुमतीमनु ||
१४५ ख
सूत उवाच:
जघन्यजस्तक्षकस्य श्रुतसेनेति यः श्रुतः |
१४६ क
सूत उवाच:
अवसद्यो महद्द्युम्नि प्रार्थय़न्नागमुख्यताम् |
१४६ ख
सूत उवाच:
करवाणि सदा चाहं नमस्तस्मै महात्मने ||
१४६ ग
सूत उवाच:
एवं स्तुवन्नपि नागान्यदा ते कुण्डले नालभदथापश्यत्स्त्रिय़ौ तन्त्रे अधिरोप्य पटं वय़न्त्यौ ||
१४७ क
सूत उवाच:
तस्मिंश्च तन्त्रे कृष्णाः सिताश्च तन्तवः |
१४८ क
सूत उवाच:
चक्रं चापश्यत्षड्भिः कुमारैः परिवर्त्यमानम् |
१४८ ख
सूत उवाच:
पुरुषं चापश्यद्दर्शनीय़म् ||
१४८ ग
सूत उवाच:
स तान्सर्वांस्तुष्टाव एभिर्मन्त्रवादश्लोकैः ||
१४९ क
सूत उवाच:
त्रीण्यर्पितान्यत्र शतानि मध्ये; षष्टिश्च नित्यं चरति ध्रुवेऽस्मिन् |
१५० क
सूत उवाच:
चक्रे चतुर्विंशतिपर्वय़ोगे; षड्यत्कुमाराः परिवर्तय़न्ति ||
१५० ख
सूत उवाच:
तन्त्रं चेदं विश्वरूपं युवत्यौ; वय़तस्तन्तून्सततं वर्तय़न्त्यौ |
१५१ क
सूत उवाच:
कृष्णान्सितांश्चैव विवर्तय़न्त्यौ; भूतान्यजस्रं भुवनानि चैव ||
१५१ ख
सूत उवाच:
वज्रस्य भर्ता भुवनस्य गोप्ता; वृत्रस्य हन्ता नमुचेर्निहन्ता |
१५२ क
सूत उवाच:
कृष्णे वसानो वसने महात्मा; सत्यानृते यो विविनक्ति लोके ||
१५२ ख
सूत उवाच:
यो वाजिनं गर्भमपां पुराणं; वैश्वानरं वाहनमभ्युपेतः |
१५३ क
सूत उवाच:
नमः सदास्मै जगदीश्वराय़; लोकत्रय़ेशाय़ पुरन्दराय़ ||
१५३ ख
सूत उवाच:
ततः स एनं पुरुषः प्राह |
१५४ क
सूत उवाच:
प्रीतोऽस्मि तेऽहमनेन स्तोत्रेण |
१५४ ख
सूत उवाच:
किं ते प्रिय़ं करवाणीति ||
१५४ ग
सूत उवाच:
स तमुवाच |
१५५ क
सूत उवाच:
नागा मे वशमीय़ुरिति ||
१५५ ख
सूत उवाच:
स एनं पुरुषः पुनरुवाच |
१५६ क
सूत उवाच:
एतमश्वमपाने धमस्वेति ||
१५६ ख
सूत उवाच:
स तमश्वमपानेऽधमत् |
१५७ क