सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः सन्दिदेश |
८० क
सूत उवाच:
वत्स वेद इहास्यताम् |
८० ख
सूत उवाच:
भवता मद्गृहे कञ्चित्कालं शुश्रूषमाणेन भवितव्यम् |
८० ग
सूत उवाच:
श्रेय़स्ते भविष्यतीति ||
८० घ
सूत उवाच:
स तथेत्युक्त्वा गुरुकुले दीर्घकालं गुरुशुश्रूषणपरोऽवसत् |
८१ क
सूत उवाच:
गौरिव नित्यं गुरुषु धूर्षु निय़ुज्यमानः शीतोष्णक्षुत्तृष्णादुःखसहः सर्वत्राप्रतिकूलः ||
८१ ख
सूत उवाच:
तस्य महता कालेन गुरुः परितोषं जगाम |
८२ क
सूत उवाच:
तत्परितोषाच्च श्रेय़ः सर्वज्ञतां चावाप |
८२ ख
सूत उवाच:
एषा तस्यापि परीक्षा वेदस्य ||
८२ ग
सूत उवाच:
स उपाध्याय़ेनानुज्ञातः समावृत्तस्तस्माद्गुरुकुलवासाद्गृहाश्रमं प्रत्यपद्यत |
८३ क
सूत उवाच:
तस्यापि स्वगृहे वसतस्त्रय़ः शिष्या वभूवुः ||
८३ ख
सूत उवाच:
स शिष्यान्न किञ्चिदुवाच |
८४ क
सूत उवाच:
कर्म वा क्रिय़तां गुरुशुश्रूषा वेति |
८४ ख
सूत उवाच:
दुःखाभिज्ञो हि गुरुकुलवासस्य शिष्यान्परिक्लेशेन योजय़ितुं नेय़ेष ||
८४ ग
सूत उवाच:
अथ कस्यचित्कालस्य वेदं व्राह्मणं जनमेजय़ः पौष्यश्च क्षत्रिय़ावुपेत्योपाध्याय़ं वरय़ां चक्रतुः ||
८५ क
सूत उवाच:
स कदाचिद्याज्यकार्येणाभिप्रस्थित उत्तङ्कं नाम शिष्यं निय़ोजय़ामास |
८६ क
सूत उवाच:
भो उत्तङ्क यत्किञ्चिदस्मद्गृहे परिहीय़ते तदिच्छाम्यहमपरिहीणं भवता क्रिय़माणमिति ||
८६ ख
सूत उवाच:
स एवं प्रतिसमादिश्योत्तङ्कं वेदः प्रवासं जगाम ||
८७ क
सूत उवाच:
अथोत्तङ्को गुरुशुश्रूषुर्गुरुनिय़ोगमनुतिष्ठमानस्तत्र गुरुकुले वसति स्म ||
८८ क
सूत उवाच:
स वसंस्तत्रोपाध्याय़स्त्रीभिः सहिताभिराहूय़ोक्तः |
८९ क
सूत उवाच:
उपाध्याय़िनी ते ऋतुमती |
८९ ख
सूत उवाच:
उपाध्याय़श्च प्रोषितः |
८९ ग
सूत उवाच:
अस्या यथाय़मृतुर्वन्ध्यो न भवति तथा क्रिय़ताम् |
८९ घ
सूत उवाच:
एतद्विषीदतीति ||
८९ 5
सूत उवाच:
स एवमुक्तस्ताः स्त्रिय़ः प्रत्युवाच |
९० क
सूत उवाच:
न मय़ा स्त्रीणां वचनादिदमकार्यं कार्यम् |
९० ख
सूत उवाच:
न ह्यहमुपाध्याय़ेन सन्दिष्टः |
९० ग
सूत उवाच:
अकार्यमपि त्वय़ा कार्यमिति ||
९० घ
सूत उवाच:
तस्य पुनरुपाध्याय़ः कालान्तरेण गृहानुपजगाम तस्मात्प्रवासात् |
९१ क
सूत उवाच:
स तद्वृत्तं तस्याशेषमुपलभ्य प्रीतिमानभूत् ||
९१ ख
सूत उवाच:
उवाच चैनम् |
९२ क
सूत उवाच:
वत्सोत्तङ्क किं ते प्रिय़ं करवाणीति |
९२ ख
सूत उवाच:
धर्मतो हि शुश्रूषितोऽस्मि भवता |
९२ ग
सूत उवाच:
तेन प्रीतिः परस्परेण नौ संवृद्धा |
९२ घ
सूत उवाच:
तदनुजाने भवन्तम् |
९२ 5
सूत उवाच:
सर्वामेव सिद्धिं प्राप्स्यसि |
९२ 6
सूत उवाच:
गम्यतामिति ||
९२ 7
सूत उवाच:
स एवमुक्तः प्रत्युवाच |
९३ क
सूत उवाच:
किं ते प्रिय़ं करवाणीति |
९३ ख
सूत उवाच:
एवं ह्याहुः ||
९३ ग
सूत उवाच:
यश्चाधर्मेण विव्रूय़ाद्यश्चाधर्मेण पृच्छति ||
९४ क
सूत उवाच:
तय़ोरन्यतरः प्रैति विद्वेषं चाधिगच्छति |
९५ क
सूत उवाच:
सोऽहमनुज्ञातो भवता इच्छामीष्टं ते गुर्वर्थमुपहर्तुमिति ||
९५ ख
सूत उवाच:
तेनैवमुक्त उपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
९६ क
सूत उवाच:
वत्सोत्तङ्क उष्यतां तावदिति ||
९६ ख
सूत उवाच:
स कदाचित्तमुपाध्याय़माहोत्तङ्कः |
९७ क
सूत उवाच:
आज्ञापय़तु भवान् |
९७ ख
सूत उवाच:
किं ते प्रिय़मुपहरामि गुर्वर्थमिति ||
९७ ग
सूत उवाच:
तमुपाध्याय़ः प्रत्युवाच |
९८ क
सूत उवाच:
वत्सोत्तङ्क वहुशो मां चोदय़सि गुर्वर्थमुपहरेय़मिति |
९८ ख
सूत उवाच:
एनां प्रविश्योपाध्याय़िनीं पृच्छ किमुपहरामीति |
९८ घ
सूत उवाच:
एषा यद्व्रवीति तदुपहरस्वेति ||
९८ 5
सूत उवाच:
स एवमुक्त उपाध्याय़ेनोपाध्याय़िनीमपृच्छत् |
९९ क
सूत उवाच:
भवत्युपाध्याय़ेनास्म्यनुज्ञातो गृहं गन्तुम् |
९९ ख
सूत उवाच:
तदिच्छामीष्टं ते गुर्वर्थमुपहृत्यानृणो गन्तुम् |
९९ ग
सूत उवाच:
तदाज्ञापय़तु भवती |
९९ घ
सूत उवाच:
किमुपहरामि गुर्वर्थमिति ||
९९ 5
सूत उवाच:
सैवमुक्तोपाध्याय़िन्युत्तङ्कं प्रत्युवाच |
१०० क
सूत उवाच:
गच्छ पौष्यं राजानम् |
१०० ख
सूत उवाच:
भिक्षस्व तस्य क्षत्रिय़या पिनद्धे कुण्डले |
१०० ग
सूत उवाच:
ते आनय़स्व |
१०० घ
सूत उवाच:
इतश्चतुर्थेऽहनि पुण्यकं भविता |
१०० 5
सूत उवाच:
ताभ्यामावद्धाभ्यां व्राह्मणान्परिवेष्टुमिच्छामि |
१०० 6
सूत उवाच:
शोभमाना यथा ताभ्यां कुण्डलाभ्यां तस्मिन्नहनि सम्पादय़स्व |
१०० 7
सूत उवाच:
श्रेय़ो हि ते स्यात्क्षणं कुर्वत इति ||
१०० 8
सूत उवाच:
स एवमुक्त उपाध्याय़िन्या प्रातिष्ठतोत्तङ्कः |
१०१ क
सूत उवाच:
स पथि गच्छन्नपश्यदृषभमतिप्रमाणं तमधिरूढं च पुरुषमतिप्रमाणमेव ||
१०१ ख
सूत उवाच:
स पुरुष उत्तङ्कमभ्यभाषत |
१०२ क
सूत उवाच:
उत्तङ्कैतत्पुरीषमस्य ऋषभस्य भक्षय़स्वेति ||
१०२ ख
सूत उवाच:
स एवमुक्तो नैच्छत् ||
१०३ क
सूत उवाच:
तमाह पुरुषो भूय़ः |
१०४ क
सूत उवाच:
भक्षय़स्वोत्तङ्क |
१०४ ख
सूत उवाच:
मा विचारय़ |
१०४ ग
सूत उवाच:
उपाध्याय़ेनापि ते भक्षितं पूर्वमिति ||
१०४ घ
सूत उवाच:
स एवमुक्तो वाढमित्युक्त्वा तदा तदृषभस्य पुरीषं मूत्रं च भक्षय़ित्वोत्तङ्कः प्रतस्थे यत्र स क्षत्रिय़ः पौष्यः ||
१०५ क
सूत उवाच:
तमुपेत्यापश्यदुत्तङ्क आसीनम् |
१०६ क
सूत उवाच:
स तमुपेत्याशीर्भिरभिनन्द्योवाच |
१०६ ख
सूत उवाच:
अर्थी भवन्तमुपगतोऽस्मीति ||
१०६ ग
सूत उवाच:
स एनमभिवाद्योवाच |
१०७ क
सूत उवाच:
भगवन्पौष्यः खल्वहम् |
१०७ ख
सूत उवाच:
किं करवाणीति ||
१०७ ग
सूत उवाच:
तमुवाचोत्तङ्कः |
१०८ क
सूत उवाच:
गुर्वर्थे कुण्डलाभ्यामर्थ्यागतोऽस्मीति ये ते क्षत्रिय़या पिनद्धे कुण्डले ते भवान्दातुमर्हतीति ||
१०८ ख
सूत उवाच:
तं पौष्यः प्रत्युवाच |
१०९ क
सूत उवाच:
प्रविश्यान्तःपुरं क्षत्रिय़ा याच्यतामिति ||
१०९ ख
सूत उवाच:
स तेनैवमुक्तः प्रविश्यान्तःपुरं क्षत्रिय़ां नापश्यत् ||
११० क
सूत उवाच:
स पौष्यं पुनरुवाच |
१११ क
सूत उवाच:
न युक्तं भवता वय़मनृतेनोपचरितुम् |
१११ ख
सूत उवाच:
न हि ते क्षत्रिय़ान्तःपुरे संनिहिता |
१११ ग
सूत उवाच:
नैनां पश्यामीति ||
१११ घ
सूत उवाच:
स एवमुक्तः पौष्यस्तं प्रत्युवाच |
११२ क
सूत उवाच:
सम्प्रति भवानुच्छिष्टः |
११२ ख
सूत उवाच:
स्मर तावत् |
११२ ग
सूत उवाच:
न हि सा क्षत्रिय़ा उच्छिष्टेनाशुचिना वा शक्या द्रष्टुम् |
११२ घ
सूत उवाच:
पतिव्रतात्वादेषा नाशुचेर्दर्शनमुपैतीति ||
११२ 5
सूत उवाच:
अथैवमुक्त उत्तङ्कः स्मृत्वोवाच |
११३ क
सूत उवाच:
अस्ति खलु मय़ोच्छिष्टेनोपस्पृष्टं शीघ्रं गच्छता चेति ||
११३ ख
सूत उवाच:
तं पौष्यः प्रत्युवाच |
११४ क
सूत उवाच:
एतत्तदेवं हि |
११४ ख