हंस उवाच:
शतमेकं च पातानां यत्प्रभाषसि वाय़स |
४८ क
हंस उवाच:
नानाविधानीह पुरा तच्चानृतमिहाद्य ते ||
४८ ख
काक उवाच:
उच्छिष्टदर्पितो हंस मन्येऽऽत्मानं सुपर्णवत् |
४९ क
काक उवाच:
अवमन्य वहूंश्चाहं काकानन्यांश्च पक्षिणः |
४९ ख
काक उवाच:
प्राणैर्हंस प्रपद्ये त्वां द्वीपान्तं प्रापय़स्व माम् ||
४९ ग
काक उवाच:
यद्यहं स्वस्तिमान्हंस स्वदेशं प्राप्नुय़ां पुनः |
५० क
काक उवाच:
न कञ्चिदवमन्येय़मापदो मां समुद्धर ||
५० ख
काक उवाच:
तमेवंवादिनं दीनं विलपन्तमचेतनम् |
५१ क
काक उवाच:
काक काकेति वाशन्तं निमज्जन्तं महार्णवे ||
५१ ख
काक उवाच:
तथैत्य वाय़सं हंसो जलक्लिन्नं सुदुर्दशम् |
५२ क
काक उवाच:
पद्भ्यामुत्क्षिप्य वेपन्तं पृष्ठमारोपय़च्छनैः ||
५२ ख
काक उवाच:
आरोप्य पृष्ठं काकं तं हंसः कर्ण विचेतसम् |
५३ क
काक उवाच:
आजगाम पुनर्द्वीपं स्पर्धय़ा पेततुर्यतः ||
५३ ख
काक उवाच:
संस्थाप्य तं चापि पुनः समाश्वास्य च खेचरम् |
५४ क
काक उवाच:
गतो यथेप्सितं देशं हंसो मन इवाशुगः ||
५४ ख
काक उवाच:
उच्छिष्टभोजनात्काको यथा वैश्यकुले तु सः |
५५ क
काक उवाच:
एवं त्वमुच्छिष्टभृतो धार्तराष्ट्रैर्न संशय़ः |
५५ ख
काक उवाच:
सदृशाञ्श्रेय़सश्चापि सर्वान्कर्णातिमन्यसे ||
५५ ग
काक उवाच:
द्रोणद्रौणिकृपैर्गुप्तो भीष्मेणान्यैश्च कौरवैः |
५६ क
काक उवाच:
विराटनगरे पार्थमेकं किं नावधीस्तदा ||
५६ ख
काक उवाच:
यत्र व्यस्ताः समस्ताश्च निर्जिताः स्थ किरीटिना |
५७ क
काक उवाच:
सृगाला इव सिंहेन क्व ते वीर्यमभूत्तदा ||
५७ ख
काक उवाच:
भ्रातरं च हतं दृष्ट्वा निर्जितः सव्यसाचिना |
५८ क
काक उवाच:
पश्यतां कुरुवीराणां प्रथमं त्वं पलाय़थाः ||
५८ ख
काक उवाच:
तथा द्वैतवने कर्ण गन्धर्वैः समभिद्रुतः |
५९ क
काक उवाच:
कुरून्समग्रानुत्सृज्य प्रथमं त्वं पलाय़थाः ||
५९ ख
काक उवाच:
हत्वा जित्वा च गन्धर्वांश्चित्रसेनमुखान्रणे |
६० क
काक उवाच:
कर्ण दुर्योधनं पार्थः सभार्यं सममोचय़त् ||
६० ख
काक उवाच:
पुनः प्रभावः पार्थस्य पुराणः केशवस्य च |
६१ क
काक उवाच:
कथितः कर्ण रामेण सभाय़ां राजसंसदि ||
६१ ख
काक उवाच:
सततं च तदश्रौषीर्वचनं द्रोणभीष्मय़ोः |
६२ क
काक उवाच:
अवध्यौ वदतोः कृष्णौ संनिधौ वै महीक्षिताम् ||
६२ ख
काक उवाच:
किय़न्तं तत्र वक्ष्यामि येन येन धनञ्जय़ः |
६३ क
काक उवाच:
त्वत्तोऽतिरिक्तः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो व्राह्मणो यथा ||
६३ ख
काक उवाच:
इदानीमेव द्रष्टासि प्रधने स्यन्दने स्थितौ |
६४ क
काक उवाच:
पुत्रं च वसुदेवस्य पाण्डवं च धनञ्जय़म् ||
६४ ख
काक उवाच:
देवासुरमनुष्येषु प्रख्यातौ यौ नरर्षभौ |
६५ क
काक उवाच:
प्रकाशेनाभिविख्यातौ त्वं तु खद्योतवन्नृषु ||
६५ ख
काक उवाच:
एवं विद्वान्मावमंस्थाः सूतपुत्राच्युतार्जुनौ |
६६ क
काक उवाच:
नृसिंहौ तौ नरश्वा त्वं जोषमास्स्व विकत्थन ||
६६ ख