chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २७४
युधिष्ठिर उवाच:
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद |
१ क
युधिष्ठिर उवाच:
अस्ति वृत्रवधादेव विवक्षा मम जाय़ते ||
१ ख
युधिष्ठिर उवाच:
ज्वरेण मोहितो वृत्रः कथितस्ते जनाधिप |
२ क
युधिष्ठिर उवाच:
निहतो वासवेनेह वज्रेणेति ममानघ ||
२ ख
युधिष्ठिर उवाच:
कथमेष महाप्राज्ञ ज्वरः प्रादुरभूत्कुतः |
३ क
युधिष्ठिर उवाच:
ज्वरोत्पत्तिं निपुणतः श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ||
३ ख
भीष्म उवाच:
शृणु राजञ्ज्वरस्येह सम्भवं लोकविश्रुतम् |
४ क
भीष्म उवाच:
विस्तरं चास्य वक्ष्यामि यादृशं चैव भारत ||
४ ख
भीष्म उवाच:
पुरा मेरोर्महाराज शृङ्गं त्रैलोक्यविश्रुतम् |
५ क
भीष्म उवाच:
ज्योतिष्कं नाम सावित्रं सर्वरत्नविभूषितम् |
५ ख
भीष्म उवाच:
अप्रमेय़मनाधृष्यं सर्वलोकेषु भारत ||
५ ग
भीष्म उवाच:
तत्र देवो गिरितटे हेमधातुविभूषिते |
६ क
भीष्म उवाच:
पर्यङ्क इव विभ्राजन्नुपविष्टो वभूव ह ||
६ ख
भीष्म उवाच:
शैलराजसुता चास्य नित्यं पार्श्वे स्थिता वभौ |
७ क
भीष्म उवाच:
तथा देवा महात्मानो वसवश्च महौजसः ||
७ ख
भीष्म उवाच:
तथैव च महात्मानावश्विनौ भिषजां वरौ |
८ क
भीष्म उवाच:
तथा वैश्रवणो राजा गुह्यकैरभिसंवृतः ||
८ ख
भीष्म उवाच:
यक्षाणामधिपः श्रीमान्कैलासनिलय़ः प्रभुः |
९ क
भीष्म उवाच:
अङ्गिरःप्रमुखाश्चैव तथा देवर्षय़ोऽपरे ||
९ ख
भीष्म उवाच:
विश्वावसुश्च गन्धर्वस्तथा नारदपर्वतौ |
१० क
भीष्म उवाच:
अप्सरोगणसङ्घाश्च समाजग्मुरनेकशः ||
१० ख
भीष्म उवाच:
ववौ शिवः सुखो वाय़ुर्नानागन्धवहः शुचिः |
११ क
भीष्म उवाच:
सर्वर्तुकुसुमोपेताः पुष्पवन्तो महाद्रुमाः ||
११ ख
भीष्म उवाच:
तथा विद्याधराश्चैव सिद्धाश्चैव तपोधनाः |
१२ क
भीष्म उवाच:
महादेवं पशुपतिं पर्युपासन्त भारत ||
१२ ख
भीष्म उवाच:
भूतानि च महाराज नानारूपधराण्यथ |
१३ क
भीष्म उवाच:
राक्षसाश्च महारौद्राः पिशाचाश्च महावलाः ||
१३ ख
भीष्म उवाच:
वहुरूपधरा हृष्टा नानाप्रहरणोद्यताः |
१४ क
भीष्म उवाच:
देवस्यानुचरास्तत्र तस्थिरे चानलोपमाः ||
१४ ख
भीष्म उवाच:
नन्दी च भगवांस्तत्र देवस्यानुमते स्थितः |
१५ क
भीष्म उवाच:
प्रगृह्य ज्वलितं शूलं दीप्यमानं स्वतेजसा ||
१५ ख
भीष्म उवाच:
गङ्गा च सरितां श्रेष्ठा सर्वतीर्थजलोद्भवा |
१६ क
भीष्म उवाच:
पर्युपासत तं देवं रूपिणी कुरुनन्दन ||
१६ ख
भीष्म उवाच:
एवं स भगवांस्तत्र पूज्यमानः सुरर्षिभिः |
१७ क
भीष्म उवाच:
देवैश्च सुमहाभागैर्महादेवो व्यतिष्ठत ||
१७ ख
भीष्म उवाच:
कस्यचित्त्वथ कालस्य दक्षो नाम प्रजापतिः |
१८ क
भीष्म उवाच:
पूर्वोक्तेन विधानेन यक्ष्यमाणोऽन्वपद्यत ||
१८ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तस्य मखं देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः |
१९ क
भीष्म उवाच:
गमनाय़ समागम्य वुद्धिमापेदिरे तदा ||
१९ ख
भीष्म उवाच:
ते विमानैर्महात्मानो ज्वलितैर्ज्वलनप्रभाः |
२० क
भीष्म उवाच:
देवस्यानुमतेऽगच्छन्गङ्गाद्वारमिति श्रुतिः ||
२० ख
भीष्म उवाच:
प्रस्थिता देवता दृष्ट्वा शैलराजसुता तदा |
२१ क
भीष्म उवाच:
उवाच वचनं साध्वी देवं पशुपतिं पतिम् ||
२१ ख
भीष्म उवाच:
भगवन्क्व नु यान्त्येते देवाः शक्रपुरोगमाः |
२२ क
भीष्म उवाच:
व्रूहि तत्त्वेन तत्त्वज्ञ संशय़ो मे महानय़म् ||
२२ ख
महेश्वर उवाच:
दक्षो नाम महाभागे प्रजानां पतिरुत्तमः |
२३ क
महेश्वर उवाच:
हय़मेधेन यजते तत्र यान्ति दिवौकसः ||
२३ ख
उमा उवाच:
यज्ञमेतं महाभाग किमर्थं नाभिगच्छसि |
२४ क
उमा उवाच:
केन वा प्रतिषेधेन गमनं ते न विद्यते ||
२४ ख
महेश्वर उवाच:
सुरैरेव महाभागे सर्वमेतदनुष्ठितम् |
२५ क
महेश्वर उवाच:
यज्ञेषु सर्वेषु मम न भाग उपकल्पितः ||
२५ ख
महेश्वर उवाच:
पूर्वोपाय़ोपपन्नेन मार्गेण वरवर्णिनि |
२६ क
महेश्वर उवाच:
न मे सुराः प्रय़च्छन्ति भागं यज्ञस्य धर्मतः ||
२६ ख
उमा उवाच:
भगवन्सर्वभूतेषु प्रभवाभ्यधिको गुणैः |
२७ क
उमा उवाच:
अजेय़श्चाप्रधृष्यश्च तेजसा यशसा श्रिय़ा ||
२७ ख
उमा उवाच:
अनेन ते महाभाग प्रतिषेधेन भागतः |
२८ क
उमा उवाच:
अतीव दुःखमुत्पन्नं वेपथुश्च ममानघ ||
२८ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्त्वा तु सा देवी देवं पशुपतिं पतिम् |
२९ क
भीष्म उवाच:
तूष्णीम्भूताभवद्राजन्दह्यमानेन चेतसा ||
२९ ख
भीष्म उवाच:
अथ देव्या मतं ज्ञात्वा हृद्गतं यच्चिकीर्षितम् |
३० क
भीष्म उवाच:
स समाज्ञापय़ामास तिष्ठ त्वमिति नन्दिनम् ||
३० ख
भीष्म उवाच:
ततो योगवलं कृत्वा सर्वय़ोगेश्वरेश्वरः |
३१ क
भीष्म उवाच:
तं यज्ञं सुमहातेजा भीमैरनुचरैस्तदा |
३१ ख
भीष्म उवाच:
सहसा घातय़ामास देवदेवः पिनाकधृक् ||
३१ ग
भीष्म उवाच:
केचिन्नादानमुञ्चन्त केचिद्धासांश्च चक्रिरे |
३२ क
भीष्म उवाच:
रुधिरेणापरे राजंस्तत्राग्निं समवाकिरन् ||
३२ ख
भीष्म उवाच:
केचिद्यूपान्समुत्पाट्य वभ्रमुर्विकृताननाः |
३३ क
भीष्म उवाच:
आस्यैरन्ये चाग्रसन्त तथैव परिचारकान् ||
३३ ख
भीष्म उवाच:
ततः स यज्ञो नृपते वध्यमानः समन्ततः |
३४ क
भीष्म उवाच:
आस्थाय़ मृगरूपं वै खमेवाभ्यपतत्तदा ||
३४ ख
भीष्म उवाच:
तं तु यज्ञं तथारूपं गच्छन्तमुपलभ्य सः |
३५ क
भीष्म उवाच:
धनुरादाय़ वाणं च तदान्वसरत प्रभुः ||
३५ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तस्य सुरेशस्य क्रोधादमिततेजसः |
३६ क
भीष्म उवाच:
ललाटात्प्रसृतो घोरः स्वेदविन्दुर्वभूव ह ||
३६ ख
भीष्म उवाच:
तस्मिन्पतितमात्रे तु स्वेदविन्दौ तथा भुवि |
३७ क
भीष्म उवाच:
प्रादुर्वभूव सुमहानग्निः कालानलोपमः ||
३७ ख
भीष्म उवाच:
तत्र चाजाय़त तदा पुरुषः पुरुषर्षभ |
३८ क
भीष्म उवाच:
ह्रस्वोऽतिमात्ररक्ताक्षो हरिश्मश्रुर्विभीषणः ||
३८ ख
भीष्म उवाच:
ऊर्ध्वकेशोऽतिलोमाङ्गः श्येनोलूकस्तथैव च |
३९ क
भीष्म उवाच:
करालः कृष्णवर्णश्च रक्तवासास्तथैव च ||
३९ ख
भीष्म उवाच:
तं यज्ञं स महासत्त्वोऽदहत्कक्षमिवानलः |
४० क
भीष्म उवाच:
देवाश्चाप्यद्रवन्सर्वे ततो भीता दिशो दश ||
४० ख
भीष्म उवाच:
तेन तस्मिन्विचरता पुरुषेण विशां पते |
४१ क
भीष्म उवाच:
पृथिवी व्यचलद्राजन्नतीव भरतर्षभ ||
४१ ख
भीष्म उवाच:
हाहाभूते प्रवृत्ते तु नादे लोकभय़ङ्करे |
४२ क
भीष्म उवाच:
पितामहो महादेवं दर्शय़न्प्रत्यभाषत ||
४२ ख
भीष्म उवाच:
भवतोऽपि सुराः सर्वे भागं दास्यन्ति वै प्रभो |
४३ क
भीष्म उवाच:
क्रिय़तां प्रतिसंहारः सर्वदेवेश्वर त्वय़ा ||
४३ ख
भीष्म उवाच:
इमा हि देवताः सर्वा ऋषय़श्च परन्तप |
४४ क
भीष्म उवाच:
तव क्रोधान्महादेव न शान्तिमुपलेभिरे ||
४४ ख
भीष्म उवाच:
यश्चैष पुरुषो जातः स्वेदात्ते विवुधोत्तम |
४५ क
भीष्म उवाच:
ज्वरो नामैष धर्मज्ञ लोकेषु प्रचरिष्यति ||
४५ ख
भीष्म उवाच:
एकीभूतस्य न ह्यस्य धारणे तेजसः प्रभो |
४६ क
भीष्म उवाच:
समर्था सकला पृथ्वी वहुधा सृज्यतामय़म् ||
४६ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तो व्रह्मणा देवो भागे चापि प्रकल्पिते |
४७ क
भीष्म उवाच:
भगवन्तं तथेत्याह व्रह्माणममितौजसम् ||
४७ ख
भीष्म उवाच:
परां च प्रीतिमगमदुत्स्मय़ंश्च पिनाकधृक् |
४८ क
भीष्म उवाच:
अवाप च तदा भागं यथोक्तं व्रह्मणा भवः ||
४८ ख
भीष्म उवाच:
ज्वरं च सर्वधर्मज्ञो वहुधा व्यसृजत्तदा |
४९ क
भीष्म उवाच:
शान्त्यर्थं सर्वभूतानां शृणु तच्चापि पुत्रक ||
४९ ख