chevron_left शान्ति पर्व अध्याय २७४
भीष्म उवाच:
शीर्षाभितापो नागानां पर्वतानां शिलाजतुः |
५० क
भीष्म उवाच:
अपां तु नीलिकां विद्यान्निर्मोकं भुजगेषु च ||
५० ख
भीष्म उवाच:
खोरकः सौरभेय़ाणामूषरं पृथिवीतले |
५१ क
भीष्म उवाच:
पशूनामपि धर्मज्ञ दृष्टिप्रत्यवरोधनम् ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
रन्ध्रागतमथाश्वानां शिखोद्भेदश्च वर्हिणाम् |
५२ क
भीष्म उवाच:
नेत्ररोगः कोकिलानां ज्वरः प्रोक्तो महात्मना ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
अव्जानां पित्तभेदश्च सर्वेषामिति नः श्रुतम् |
५३ क
भीष्म उवाच:
शुकानामपि सर्वेषां हिक्किका प्रोच्यते ज्वरः ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
शार्दूलेष्वथ धर्मज्ञ श्रमो ज्वर इहोच्यते |
५४ क
भीष्म उवाच:
मानुषेषु तु धर्मज्ञ ज्वरो नामैष विश्रुतः |
५४ ख
भीष्म उवाच:
मरणे जन्मनि तथा मध्ये चाविशते नरम् ||
५४ ग
भीष्म उवाच:
एतन्माहेश्वरं तेजो ज्वरो नाम सुदारुणः |
५५ क
भीष्म उवाच:
नमस्यश्चैव मान्यश्च सर्वप्राणिभिरीश्वरः ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
अनेन हि समाविष्टो वृत्रो धर्मभृतां वरः |
५६ क
भीष्म उवाच:
व्यजृम्भत ततः शक्रस्तस्मै वज्रमवासृजत् ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
प्रविश्य वज्रो वृत्रं तु दारय़ामास भारत |
५७ क
भीष्म उवाच:
दारितश्च स वज्रेण महाय़ोगी महासुरः |
५७ ख
भीष्म उवाच:
जगाम परमं स्थानं विष्णोरमिततेजसः ||
५७ ग
भीष्म उवाच:
विष्णुभक्त्या हि तेनेदं जगद्व्याप्तमभूत्पुरा |
५८ क
भीष्म उवाच:
तस्माच्च निहतो युद्धे विष्णोः स्थानमवाप्तवान् ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
इत्येष वृत्रमाश्रित्य ज्वरस्य महतो मय़ा |
५९ क
भीष्म उवाच:
विस्तरः कथितः पुत्र किमन्यत्प्रव्रवीमि ते ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
इमां ज्वरोत्पत्तिमदीनमानसः; पठेत्सदा यः सुसमाहितो नरः |
६० क
भीष्म उवाच:
विमुक्तरोगः स सुखी मुदा युतो; लभेत कामान्स यथामनीषितान् ||
६० ख