मार्कण्डेय़ उवाच:
मारीचस्त्वथ सम्भ्रान्तो दृष्ट्वा रावणमागतम् |
१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पूजय़ामास सत्कारैः फलमूलादिभिस्तथा ||
१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विश्रान्तं चैनमासीनमन्वासीनः स राक्षसः |
२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उवाच प्रश्रितं वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् ||
२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
न ते प्रकृतिमान्वर्णः कच्चित्क्षेमं पुरे तव |
३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कच्चित्प्रकृतय़ः सर्वा भजन्ते त्वां यथा पुरा ||
३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
किमिहागमने चापि कार्यं ते राक्षसेश्वर |
४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कृतमित्येव तद्विद्धि यद्यपि स्यात्सुदुष्करम् ||
४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शशंस रावणस्तस्मै तत्सर्वं रामचेष्टितम् |
५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मारीचस्त्वव्रवीच्छ्रुत्वा समासेनैव रावणम् ||
५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अलं ते राममासाद्य वीर्यज्ञो ह्यस्मि तस्य वै |
६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वाणवेगं हि कस्तस्य शक्तः सोढुं महात्मनः ||
६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रव्रज्याय़ां हि मे हेतुः स एव पुरुषर्षभः |
७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
विनाशमुखमेतत्ते केनाख्यातं दुरात्मना ||
७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमुवाचाथ सक्रोधो रावणः परिभर्त्सय़न् |
८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अकुर्वतोऽस्मद्वचनं स्यान्मृत्युरपि ते ध्रुवम् ||
८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मारीचश्चिन्तय़ामास विशिष्टान्मरणं वरम् |
९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अवश्यं मरणे प्राप्ते करिष्याम्यस्य यन्मतम् ||
९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तं प्रत्युवाचाथ मारीचो राक्षसेश्वरम् |
१० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
किं ते साह्यं मय़ा कार्यं करिष्याम्यवशोऽपि तत् ||
१० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमव्रवीद्दशग्रीवो गच्छ सीतां प्रलोभय़ |
११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रत्नशृङ्गो मृगो भूत्वा रत्नचित्रतनूरुहः ||
११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ध्रुवं सीता समालक्ष्य त्वां रामं चोदय़िष्यति |
१२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपक्रान्ते च काकुत्स्थे सीता वश्या भविष्यति ||
१२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तामादाय़ापनेष्यामि ततः स न भविष्यति |
१३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भार्याविय़ोगाद्दुर्वुद्धिरेतत्साह्यं कुरुष्व मे ||
१३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्येवमुक्तो मारीचः कृत्वोदकमथात्मनः |
१४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रावणं पुरतो यान्तमन्वगच्छत्सुदुःखितः ||
१४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तस्याश्रमं गत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः |
१५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चक्रतुस्तत्तथा सर्वमुभौ यत्पूर्वमन्त्रितम् ||
१५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रावणस्तु यतिर्भूत्वा मुण्डः कुण्डी त्रिदण्डधृक् |
१६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मृगश्च भूत्वा मारीचस्तं देशमुपजग्मतुः ||
१६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
दर्शय़ामास वैदेहीं मारीचो मृगरूपधृक् |
१७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चोदय़ामास तस्यार्थे सा रामं विधिचोदिता ||
१७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामस्तस्याः प्रिय़ं कुर्वन्धनुरादाय़ सत्वरः |
१८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रक्षार्थे लक्ष्मणं न्यस्य प्रय़यौ मृगलिप्सय़ा ||
१८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स धन्वी वद्धतूणीरः खड्गगोधाङ्गुलित्रवान् |
१९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्वधावन्मृगं रामो रुद्रस्तारामृगं यथा ||
१९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सोऽन्तर्हितः पुनस्तस्य दर्शनं राक्षसो व्रजन् |
२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चकर्ष महदध्वानं रामस्तं वुवुधे ततः ||
२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
निशाचरं विदित्वा तं राघवः प्रतिभानवान् |
२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अमोघं शरमादाय़ जघान मृगरूपिणम् ||
२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स रामवाणाभिहतः कृत्वा रामस्वरं तदा |
२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हा सीते लक्ष्मणेत्येवं चुक्रोशार्तस्वरेण ह ||
२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शुश्राव तस्य वैदेही ततस्तां करुणां गिरम् |
२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा प्राद्रवद्यतः शव्दस्तामुवाचाथ लक्ष्मणः ||
२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अलं ते शङ्कय़ा भीरु को रामं विषहिष्यति |
२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मुहूर्ताद्द्रक्ष्यसे राममागतं तं शुचिस्मिते ||
२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्त्वा सा प्ररुदती पर्यशङ्कत देवरम् |
२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हता वै स्त्रीस्वभावेन शुद्धचारित्रभूषणम् ||
२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा तं परुषमारव्धा वक्तुं साध्वी पतिव्रता |
२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नैष कालो भवेन्मूढ यं त्वं प्रार्थय़से हृदा ||
२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अप्यहं शस्त्रमादाय़ हन्यामात्मानमात्मना |
२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पतेय़ं गिरिशृङ्गाद्वा विशेय़ं वा हुताशनम् ||
२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
रामं भर्तारमुत्सृज्य न त्वहं त्वां कथञ्चन |
२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निहीनमुपतिष्ठेय़ं शार्दूली क्रोष्टुकं यथा ||
२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एतादृशं वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः प्रिय़राघवः |
२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पिधाय़ कर्णौ सद्वृत्तः प्रस्थितो येन राघवः |
२९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
स रामस्य पदं गृह्य प्रससार धनुर्धरः ||
२९ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
एतस्मिन्नन्तरे रक्षो रावणः प्रत्यदृश्यत |
३० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभव्यो भव्यरूपेण भस्मच्छन्न इवानलः |
३० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यतिवेषप्रतिच्छन्नो जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ||
३० ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
सा तमालक्ष्य सम्प्राप्तं धर्मज्ञा जनकात्मजा |
३१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निमन्त्रय़ामास तदा फलमूलाशनादिभिः ||
३१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अवमन्य स तत्सर्वं स्वरूपं प्रतिपद्य च |
३२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सान्त्वय़ामास वैदेहीमिति राक्षसपुङ्गवः ||
३२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सीते राक्षसराजोऽहं रावणो नाम विश्रुतः |
३३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मम लङ्का पुरी नाम्ना रम्या पारे महोदधेः ||
३३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तत्र त्वं वरनारीषु शोभिष्यसि मय़ा सह |
३४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भार्या मे भव सुश्रोणि तापसं त्यज राघवम् ||
३४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एवमादीनि वाक्यानि श्रुत्वा सीताथ जानकी |
३५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पिधाय़ कर्णौ सुश्रोणी मैवमित्यव्रवीद्वचः ||
३५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रपतेद्द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् |
३६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शैत्यमग्निरिय़ान्नाहं त्यजेय़ं रघुनन्दनम् ||
३६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कथं हि भिन्नकरटं पद्मिनं वनगोचरम् |
३७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उपस्थाय़ महानागं करेणुः सूकरं स्पृशेत् ||
३७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
कथं हि पीत्वा माध्वीकं पीत्वा च मधुमाधवीम् |
३८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
लोभं सौवीरके कुर्यान्नारी काचिदिति स्मरे ||
३८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इति सा तं समाभाष्य प्रविवेशाश्रमं पुनः |
३९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तामनुद्रुत्य सुश्रोणीं रावणः प्रत्यषेधय़त् ||
३९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
भर्त्सय़ित्वा तु रूक्षेण स्वरेण गतचेतनाम् |
४० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मूर्धजेषु निजग्राह खमुपाचक्रमे ततः ||
४० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तां ददर्श तदा गृध्रो जटाय़ुर्गिरिगोचरः |
४१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रुदतीं राम रामेति ह्रिय़माणां तपस्विनीम् ||
४१ ख