chevron_left कर्ण पर्व अध्याय २४
दुर्योधन उवाच:
तैस्तदा दर्पमोहान्धैरवाध्यन्त दिवौकसः ||
१४२ ख
दुर्योधन उवाच:
ततः सम्भूय़ विवुधास्तान्हन्तुं कृतनिश्चय़ाः |
१४३ क
दुर्योधन उवाच:
चक्रुः शत्रुवधे यत्नं न शेकुर्जेतुमेव ते ||
१४३ ख
दुर्योधन उवाच:
अभिगम्य ततो देवा महेश्वरमथाव्रुवन् |
१४४ क
दुर्योधन उवाच:
प्रसादय़न्तस्तं भक्त्या जहि शत्रुगणानिति ||
१४४ ख
दुर्योधन उवाच:
प्रतिज्ञाय़ ततो देवो देवतानां रिपुक्षय़म् |
१४५ क
दुर्योधन उवाच:
रामं भार्गवमाहूय़ सोऽभ्यभाषत शङ्करः ||
१४५ ख
दुर्योधन उवाच:
रिपून्भार्गव देवानां जहि सर्वान्समागतान् |
१४६ क
दुर्योधन उवाच:
लोकानां हितकामार्थं मत्प्रीत्यर्थं तथैव च ||
१४६ ख
राम उवाच:
अकृतास्त्रस्य देवेश का शक्तिर्मे महेश्वर |
१४७ क
राम उवाच:
निहन्तुं दानवान्सर्वान्कृतास्त्रान्युद्धदुर्मदान् ||
१४७ ख
ईश्वर उवाच:
गच्छ त्वं मदनुध्यानान्निहनिष्यसि दानवान् |
१४८ क
ईश्वर उवाच:
विजित्य च रिपून्सर्वान्गुणान्प्राप्स्यसि पुष्कलान् ||
१४८ ख
दुर्योधन उवाच:
एतच्छ्रुत्वा च वचनं प्रतिगृह्य च सर्वशः |
१४९ क
दुर्योधन उवाच:
रामः कृतस्वस्त्ययनः प्रय़यौ दानवान्प्रति ||
१४९ ख
दुर्योधन उवाच:
अवधीद्देवशत्रूंस्तान्मददर्पवलान्वितान् |
१५० क
दुर्योधन उवाच:
वज्राशनिसमस्पर्शैः प्रहारैरेव भार्गवः ||
१५० ख
दुर्योधन उवाच:
स दानवैः क्षततनुर्जामदग्न्यो द्विजोत्तमः |
१५१ क
दुर्योधन उवाच:
संस्पृष्टः स्थाणुना सद्यो निर्व्रणः समजाय़त ||
१५१ ख
दुर्योधन उवाच:
प्रीतश्च भगवान्देवः कर्मणा तेन तस्य वै |
१५२ क
दुर्योधन उवाच:
वरान्प्रादाद्व्रह्मविदे भार्गवाय़ महात्मने ||
१५२ ख
दुर्योधन उवाच:
उक्तश्च देवदेवेन प्रीतिय़ुक्तेन शूलिना |
१५३ क
दुर्योधन उवाच:
निपातात्तव शस्त्राणां शरीरे याभवद्रुजा ||
१५३ ख
दुर्योधन उवाच:
तय़ा ते मानुषं कर्म व्यपोढं भृगुनन्दन |
१५४ क
दुर्योधन उवाच:
गृहाणास्त्राणि दिव्यानि मत्सकाशाद्यथेप्सितम् ||
१५४ ख
दुर्योधन उवाच:
ततोऽस्त्राणि समस्तानि वरांश्च मनसेप्सितान् |
१५५ क
दुर्योधन उवाच:
लव्ध्वा वहुविधान्रामः प्रणम्य शिरसा शिवम् ||
१५५ ख
दुर्योधन उवाच:
अनुज्ञां प्राप्य देवेशाज्जगाम स महातपाः |
१५६ क
दुर्योधन उवाच:
एवमेतत्पुरावृत्तं तदा कथितवानृषिः ||
१५६ ख
दुर्योधन उवाच:
भार्गवोऽप्यददात्सर्वं धनुर्वेदं महात्मने |
१५७ क
दुर्योधन उवाच:
कर्णाय़ पुरुषव्याघ्र सुप्रीतेनान्तरात्मना ||
१५७ ख
दुर्योधन उवाच:
वृजिनं हि भवेत्किञ्चिद्यदि कर्णस्य पार्थिव |
१५८ क
दुर्योधन उवाच:
नास्मै ह्यस्त्राणि दिव्यानि प्रादास्यद्भृगुनन्दनः ||
१५८ ख
दुर्योधन उवाच:
नापि सूतकुले जातं कर्णं मन्ये कथञ्चन |
१५९ क
दुर्योधन उवाच:
देवपुत्रमहं मन्ये क्षत्रिय़ाणां कुलोद्भवम् ||
१५९ ख
दुर्योधन उवाच:
सकुण्डलं सकवचं दीर्घवाहुं महारथम् |
१६० क
दुर्योधन उवाच:
कथमादित्यसदृशं मृगी व्याघ्रं जनिष्यति ||
१६० ख
दुर्योधन उवाच:
पश्य ह्यस्य भुजौ पीनौ नागराजकरोपमौ |
१६१ क
दुर्योधन उवाच:
वक्षः पश्य विशालं च सर्वशत्रुनिवर्हणम् ||
१६१ ख