दुर्योधन उवाच:
नमो देवातिदेवाय़ धन्विने चातिमन्यवे |
४५ क
दुर्योधन उवाच:
प्रजापतिमखघ्नाय़ प्रजापतिभिरीड्यसे ||
४५ ख
दुर्योधन उवाच:
नमः स्तुताय़ स्तुत्याय़ स्तूय़मानाय़ मृत्यवे |
४६ क
दुर्योधन उवाच:
विलोहिताय़ रुद्राय़ नीलग्रीवाय़ शूलिने ||
४६ ख
दुर्योधन उवाच:
अमोघाय़ मृगाक्षाय़ प्रवराय़ुधय़ोधिने |
४७ क
दुर्योधन उवाच:
दुर्वारणाय़ शुक्राय़ व्रह्मणे व्रह्मचारिणे ||
४७ ख
दुर्योधन उवाच:
ईशानाय़ाप्रमेय़ाय़ निय़न्त्रे चर्मवाससे |
४८ क
दुर्योधन उवाच:
तपोनित्याय़ पिङ्गाय़ व्रतिने कृत्तिवाससे ||
४८ ख
दुर्योधन उवाच:
कुमारपित्रे त्र्यक्षाय़ प्रवराय़ुधधारिणे |
४९ क
दुर्योधन उवाच:
प्रपन्नार्तिविनाशाय़ व्रह्मद्विट्सङ्घघातिने ||
४९ ख
दुर्योधन उवाच:
वनस्पतीनां पतय़े नराणां पतय़े नमः |
५० क
दुर्योधन उवाच:
गवां च पतय़े नित्यं यज्ञानां पतय़े नमः ||
५० ख
दुर्योधन उवाच:
नमोऽस्तु ते ससैन्याय़ त्र्यम्वकाय़ोग्रतेजसे |
५१ क
दुर्योधन उवाच:
मनोवाक्कर्मभिर्देव त्वां प्रपन्नान्भजस्व नः ||
५१ ख
दुर्योधन उवाच:
ततः प्रसन्नो भगवान्स्वागतेनाभिनन्द्य तान् |
५२ क
दुर्योधन उवाच:
प्रोवाच व्येतु वस्त्रासो व्रूत किं करवाणि वः ||
५२ ख
दुर्योधन उवाच:
पितृदेवर्षिसङ्घेभ्यो वरे दत्ते महात्मना |
५३ क
दुर्योधन उवाच:
सत्कृत्य शङ्करं प्राह व्रह्मा लोकहितं वचः ||
५३ ख
दुर्योधन उवाच:
तवातिसर्गाद्देवेश प्राजापत्यमिदं पदम् |
५४ क
दुर्योधन उवाच:
मय़ाधितिष्ठता दत्तो दानवेभ्यो महान्वरः ||
५४ ख
दुर्योधन उवाच:
तानतिक्रान्तमर्यादान्नान्यः संहर्तुमर्हति |
५५ क
दुर्योधन उवाच:
त्वामृते भूतभव्येश त्वं ह्येषां प्रत्यरिर्वधे ||
५५ ख
दुर्योधन उवाच:
स त्वं देव प्रपन्नानां याचतां च दिवौकसाम् |
५६ क
दुर्योधन उवाच:
कुरु प्रसादं देवेश दानवाञ्जहि शूलभृत् ||
५६ ख
श्रीभगवानु उवाच:
हन्तव्याः शत्रवः सर्वे युष्माकमिति मे मतिः |
५७ क
श्रीभगवानु उवाच:
न त्वेकोऽहं वधे तेषां समर्थो वै सुरद्विषाम् ||
५७ ख
श्रीभगवानु उवाच:
ते यूय़ं सहिताः सर्वे मदीय़ेनास्त्रतेजसा |
५८ क
श्रीभगवानु उवाच:
जय़ध्वं युधि ताञ्शत्रून्सङ्घातो हि महावलः ||
५८ ख
देवा ऊचुः:
अस्मत्तेजोवलं यावत्तावद्द्विगुणमेव च |
५९ क
देवा ऊचुः:
तेषामिति ह मन्यामो दृष्टतेजोवला हि ते ||
५९ ख
भगवानु उवाच:
वध्यास्ते सर्वतः पापा ये युष्मास्वपराधिनः |
६० क
भगवानु उवाच:
मम तेजोवलार्धेन सर्वांस्तान्घ्नत शात्रवान् ||
६० ख
देवा ऊचुः:
विभर्तुं तेजसोऽर्धं ते न शक्ष्यामो महेश्वर |
६१ क
देवा ऊचुः:
सर्वेषां नो वलार्धेन त्वमेव जहि शात्रवान् ||
६१ ख
दुर्योधन उवाच:
ततस्तथेति देवेशस्तैरुक्तो राजसत्तम |
६२ क
दुर्योधन उवाच:
अर्धमादाय़ सर्वेभ्यस्तेजसाभ्यधिकोऽभवत् ||
६२ ख
दुर्योधन उवाच:
स तु देवो वलेनासीत्सर्वेभ्यो वलवत्तरः |
६३ क
दुर्योधन उवाच:
महादेव इति ख्यातस्तदाप्रभृति शङ्करः ||
६३ ख
दुर्योधन उवाच:
ततोऽव्रवीन्महादेवो धनुर्वाणधरस्त्वहम् |
६४ क
दुर्योधन उवाच:
हनिष्यामि रथेनाजौ तान्रिपून्वै दिवौकसः ||
६४ ख
दुर्योधन उवाच:
ते यूय़ं मे रथं चैव धनुर्वाणं तथैव च |
६५ क
दुर्योधन उवाच:
पश्यध्वं यावदद्यैतान्पातय़ामि महीतले ||
६५ ख
देवा ऊचुः:
मूर्तिसर्वस्वमादाय़ त्रैलोक्यस्य ततस्ततः |
६६ क
देवा ऊचुः:
रथं ते कल्पय़िष्याम देवेश्वर महौजसम् ||
६६ ख
देवा ऊचुः:
तथैव वुद्ध्या विहितं विश्वकर्मकृतं शुभम् |
६७ क
देवा ऊचुः:
ततो विवुधशार्दूलास्तं रथं समकल्पय़न् ||
६७ ख
देवा ऊचुः:
वन्धुरं पृथिवीं देवीं विशालपुरमालिनीम् |
६८ क
देवा ऊचुः:
सपर्वतवनद्वीपां चक्रुर्भूतधरां तदा ||
६८ ख
देवा ऊचुः:
मन्दरं पर्वतं चाक्षं जङ्घास्तस्य महानदीः |
६९ क
देवा ऊचुः:
दिशश्च प्रदिशश्चैव परिवारं रथस्य हि ||
६९ ख
देवा ऊचुः:
अनुकर्षान्ग्रहान्दीप्तान्वरूथं चापि तारकाः |
७० क
देवा ऊचुः:
धर्मार्थकामसंय़ुक्तं त्रिवेणुं चापि वन्धुरम् |
७० ख
देवा ऊचुः:
ओषधीर्विविधास्तत्र नानापुष्पफलोद्गमाः ||
७० ग
देवा ऊचुः:
सूर्याचन्द्रमसौ कृत्वा चक्रे रथवरोत्तमे |
७१ क
देवा ऊचुः:
पक्षौ पूर्वापरौ तत्र कृते रात्र्यहनी शुभे ||
७१ ख
देवा ऊचुः:
दश नागपतीनीषां धृतराष्ट्रमुखान्दृढाम् |
७२ क
देवा ऊचुः:
द्यां युगं युगचर्माणि संवर्तकवलाहकान् ||
७२ ख
देवा ऊचुः:
शम्यां धृतिं च मेधां च स्थितिं संनतिमेव च |
७३ क
देवा ऊचुः:
ग्रहनक्षत्रताराभिश्चर्म चित्रं नभस्तलम् ||
७३ ख
देवा ऊचुः:
सुराम्वुप्रेतवित्तानां पतीँल्लोकेश्वरान्हय़ान् |
७४ क
देवा ऊचुः:
सिनीवालीमनुमतिं कुहूं राकां च सुव्रताम् |
७४ ख
देवा ऊचुः:
योक्त्राणि चक्रुर्वाहानां रोहकांश्चापि कण्ठकम् ||
७४ ग
देवा ऊचुः:
कर्म सत्यं तपोऽर्थश्च विहितास्तत्र रश्मय़ः |
७५ क
देवा ऊचुः:
अधिष्ठानं मनस्त्वासीत्परिरथ्यं सरस्वती ||
७५ ख
देवा ऊचुः:
नानावर्णाश्च चित्राश्च पताकाः पवनेरिताः |
७६ क
देवा ऊचुः:
विद्युदिन्द्रधनुर्नद्धं रथं दीप्तं व्यदीपय़त् ||
७६ ख
देवा ऊचुः:
एवं तस्मिन्महाराज कल्पिते रथसत्तमे |
७७ क
देवा ऊचुः:
देवैर्मनुजशार्दूल द्विषतामभिमर्दने ||
७७ ख
देवा ऊचुः:
स्वान्याय़ुधानि मुख्यानि न्यदधाच्छङ्करो रथे |
७८ क
देवा ऊचुः:
रथय़ष्टिं विय़त्कृष्टां स्थापय़ामास गोवृषम् ||
७८ ख
देवा ऊचुः:
व्रह्मदण्डः कालदण्डो रुद्रदण्डस्तथा ज्वरः |
७९ क
देवा ऊचुः:
परिस्कन्दा रथस्यास्य सर्वतोदिशमुद्यताः ||
७९ ख
देवा ऊचुः:
अथर्वाङ्गिरसावास्तां चक्ररक्षौ महात्मनः |
८० क
देवा ऊचुः:
ऋग्वेदः सामवेदश्च पुराणं च पुरःसराः ||
८० ख
देवा ऊचुः:
इतिहासय़जुर्वेदौ पृष्ठरक्षौ वभूवतुः |
८१ क
देवा ऊचुः:
दिव्या वाचश्च विद्याश्च परिपार्श्वचराः कृताः ||
८१ ख
देवा ऊचुः:
तोत्त्रादय़श्च राजेन्द्र वषट्कारस्तथैव च |
८२ क
देवा ऊचुः:
ओङ्कारश्च मुखे राजन्नतिशोभाकरोऽभवत् ||
८२ ख
देवा ऊचुः:
विचित्रमृतुभिः षड्भिः कृत्वा संवत्सरं धनुः |
८३ क
देवा ऊचुः:
तस्मान्नॄणां कालरात्रिर्ज्या कृता धनुषोऽजरा ||
८३ ख
देवा ऊचुः:
इषुश्चाप्यभवद्विष्णुर्ज्वलनः सोम एव च |
८४ क
देवा ऊचुः:
अग्नीषोमौ जगत्कृत्स्नं वैष्णवं चोच्यते जगत् ||
८४ ख
देवा ऊचुः:
विष्णुश्चात्मा भगवतो भवस्यामिततेजसः |
८५ क
देवा ऊचुः:
तस्माद्धनुर्ज्यासंस्पर्शं न विषेहुर्हरस्य ते ||
८५ ख
देवा ऊचुः:
तस्मिञ्शरे तिग्ममन्युर्मुमोचाविषहं प्रभुः |
८६ क
देवा ऊचुः:
भृग्वङ्गिरोमन्युभवं क्रोधाग्निमतिदुःसहम् ||
८६ ख
देवा ऊचुः:
स नीललोहितो धूम्रः कृत्तिवासा भय़ङ्करः |
८७ क
देवा ऊचुः:
आदित्याय़ुतसङ्काशस्तेजोज्वालावृतो ज्वलन् ||
८७ ख
देवा ऊचुः:
दुश्च्यावश्च्यावनो जेता हन्ता व्रह्मद्विषां हरः |
८८ क
देवा ऊचुः:
नित्यं त्राता च हन्ता च धर्माधर्माश्रिताञ्जनान् ||
८८ ख
देवा ऊचुः:
प्रमाथिभिर्घोररूपैर्भीमोदग्रैर्गणैर्वृतः |
८९ क
देवा ऊचुः:
विभाति भगवान्स्थाणुस्तैरेवात्मगुणैर्वृतः ||
८९ ख
देवा ऊचुः:
तस्याङ्गानि समाश्रित्य स्थितं विश्वमिदं जगत् |
९० क
देवा ऊचुः:
जङ्गमाजङ्गमं राजञ्शुशुभेऽद्भुतदर्शनम् ||
९० ख
देवा ऊचुः:
दृष्ट्वा तु तं रथं दिव्यं कवची स शरासनी |
९१ क
देवा ऊचुः:
वाणमादत्त तं दिव्यं सोमविष्ण्वग्निसम्भवम् ||
९१ ख
देवा ऊचुः:
तस्य वाजांस्ततो देवाः कल्पय़ां चक्रिरे विभोः |
९२ क
देवा ऊचुः:
पुण्यगन्धवहं राजञ्श्वसनं राजसत्तम ||
९२ ख
देवा ऊचुः:
तमास्थाय़ महादेवस्त्रासय़न्दैवतान्यपि |
९३ क
देवा ऊचुः:
आरुरोह तदा यत्तः कम्पय़न्निव रोदसी ||
९३ ख