chevron_left वन पर्व अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः समुद्रं पश्यामि यादोगणनिषेवितम् |
९७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
रत्नाकरममित्रघ्न निधानं पय़सो महत् ||
९७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः पश्यामि गगनं चन्द्रसूर्यविराजितम् |
९८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
जाज्वल्यमानं तेजोभिः पावकार्कसमप्रभैः |
९८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पश्यामि च महीं राजन्काननैरुपशोभिताम् ||
९८ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
यजन्ते हि तदा राजन्व्राह्मणा वहुभिः सवैः |
९९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षत्रिय़ाश्च प्रवर्तन्ते सर्ववर्णानुरञ्जने ||
९९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वैश्याः कृषिं यथान्याय़ं कारय़न्ति नराधिप |
१०० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शुश्रूषाय़ां च निरता द्विजानां वृषलास्तथा ||
१०० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः परिपतन्राजंस्तस्य कुक्षौ महात्मनः |
१०१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हिमवन्तं च पश्यामि हेमकूटं च पर्वतम् ||
१०१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
निषधं चापि पश्यामि श्वेतं च रजताचितम् |
१०२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पश्यामि च महीपाल पर्वतं गन्धमादनम् ||
१०२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मन्दरं मनुजव्याघ्र नीलं चापि महागिरिम् |
१०३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पश्यामि च महाराज मेरुं कनकपर्वतम् ||
१०३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
महेन्द्रं चैव पश्यामि विन्ध्यं च गिरिमुत्तमम् |
१०४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मलय़ं चापि पश्यामि पारिय़ात्रं च पर्वतम् ||
१०४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एते चान्ये च वहवो यावन्तः पृथिवीधराः |
१०५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्योदरे मय़ा दृष्टाः सर्वरत्नविभूषिताः ||
१०५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सिंहान्व्याघ्रान्वराहांश्च नागांश्च मनुजाधिप |
१०६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पृथिव्यां यानि चान्यानि सत्त्वानि जगतीपते |
१०६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तानि सर्वाण्यहं तत्र पश्यन्पर्यचरं तदा ||
१०६ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
कुक्षौ तस्य नरव्याघ्र प्रविष्टः सञ्चरन्दिशः |
१०७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
शक्रादींश्चापि पश्यामि कृत्स्नान्देवगणांस्तथा ||
१०७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गन्धर्वाप्सरसो यक्षानृषींश्चैव महीपते |
१०८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दैत्यदानवसङ्घांश्च कालेय़ांश्च नराधिप |
१०८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सिंहिकातनय़ांश्चापि ये चान्ये सुरशत्रवः ||
१०८ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
यच्च किञ्चिन्मय़ा लोके दृष्टं स्थावरजङ्गमम् |
१०९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तदपश्यमहं सर्वं तस्य कुक्षौ महात्मनः |
१०९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
फलाहारः प्रविचरन्कृत्स्नं जगदिदं तदा ||
१०९ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
अन्तः शरीरे तस्याहं वर्षाणामधिकं शतम् |
११० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
न च पश्यामि तस्याहमन्तं देहस्य कुत्रचित् ||
११० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सततं धावमानश्च चिन्तय़ानो विशां पते |
१११ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आसादय़ामि नैवान्तं तस्य राजन्महात्मनः ||
१११ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तमेव शरणं गतोऽस्मि विधिवत्तदा |
११२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वरेण्यं वरदं देवं मनसा कर्मणैव च ||
११२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततोऽहं सहसा राजन्वाय़ुवेगेन निःसृतः |
११३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
महात्मनो मुखात्तस्य विवृतात्पुरुषोत्तम ||
११३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तस्यैव शाखाय़ां न्यग्रोधस्य विशां पते |
११४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आस्ते मनुजशार्दूल कृत्स्नमादाय़ वै जगत् ||
११४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तेनैव वालवेषेण श्रीवत्सकृतलक्षणम् |
११५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आसीनं तं नरव्याघ्र पश्याम्यमिततेजसम् ||
११५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो मामव्रवीद्वीर स वालः प्रहसन्निव |
११६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्रीवत्सधारी द्युतिमान्पीतवासा महाद्युतिः ||
११६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपीदानीं शरीरेऽस्मिन्मामके मुनिसत्तम |
११७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उषितस्त्वं सुविश्रान्तो मार्कण्डेय़ व्रवीहि मे ||
११७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
मुहूर्तादथ मे दृष्टिः प्रादुर्भूता पुनर्नवा |
११८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
यय़ा निर्मुक्तमात्मानमपश्यं लव्धचेतसम् ||
११८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्य ताम्रतलौ तात चरणौ सुप्रतिष्ठितौ |
११९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुजातौ मृदुरक्ताभिरङ्गुलीभिरलङ्कृतौ ||
११९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रय़तेन मय़ा मूर्ध्ना गृहीत्वा ह्यभिवन्दितौ |
१२० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दृष्ट्वापरिमितं तस्य प्रभावममितौजसः ||
१२० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विनय़ेनाञ्जलिं कृत्वा प्रय़त्नेनोपगम्य च |
१२१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दृष्टो मय़ा स भूतात्मा देवः कमललोचनः ||
१२१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तमहं प्राञ्जलिर्भूत्वा नमस्कृत्येदमव्रुवम् |
१२२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ज्ञातुमिच्छामि देव त्वां माय़ां चेमां तवोत्तमाम् ||
१२२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
आस्येनानुप्रविष्टोऽहं शरीरं भगवंस्तव |
१२३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दृष्टवानखिलाँल्लोकान्समस्ताञ्जठरे तव ||
१२३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तव देव शरीरस्था देवदानवराक्षसाः |
१२४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
यक्षगन्धर्वनागाश्च जगत्स्थावरजङ्गमम् ||
१२४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्वत्प्रसादाच्च मे देव स्मृतिर्न परिहीय़ते |
१२५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
द्रुतमन्तः शरीरे ते सततं परिधावतः ||
१२५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
इच्छामि पुण्डरीकाक्ष ज्ञातुं त्वाहमनिन्दित |
१२६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
इह भूत्वा शिशुः साक्षात्किं भवानवतिष्ठते |
१२६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पीत्वा जगदिदं विश्वमेतदाख्यातुमर्हसि ||
१२६ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
किमर्थं च जगत्सर्वं शरीरस्थं तवानघ |
१२७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
किय़न्तं च त्वय़ा कालमिह स्थेय़मरिन्दम ||
१२७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एतदिच्छामि देवेश श्रोतुं व्राह्मणकाम्यया |
१२८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
त्वत्तः कमलपत्राक्ष विस्तरेण यथातथम् |
१२८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
महद्ध्येतदचिन्त्यं च यदहं दृष्टवान्प्रभो ||
१२८ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
इत्युक्तः स मय़ा श्रीमान्देवदेवो महाद्युतिः |
१२९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सान्त्वय़न्मामिदं वाक्यमुवाच वदतां वरः ||
१२९ ख