chevron_left वन पर्व अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच:
अल्पाय़ुषो दरिद्राश्च धर्मिष्ठा मानवास्तदा |
४८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दीर्घाय़ुषः समृद्धाश्च विधर्माणो युगक्षय़े ||
४८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अधर्मिष्ठैरुपाय़ैश्च प्रजा व्यवहरन्त्युत |
४९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सञ्चय़ेनापि चाल्पेन भवन्त्याढ्या मदान्विताः ||
४९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूय़िष्ठशो नराः |
५० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
हर्तुं व्यवसिता राजन्माय़ाचारसमन्विताः ||
५० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणोऽथ मृगास्तथा |
५१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते ||
५१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च स्त्रिय़ो गर्भधरा नृप |
५२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्रः प्रजाय़ते ||
५२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
भवन्ति षोडशे वर्षे नराः पलितिनस्तथा |
५३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आय़ुःक्षय़ो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते ||
५३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
क्षीणे युगे महाराज तरुणा वृद्धशीलिनः |
५४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तरुणानां च यच्छीलं तद्वृद्धेषु प्रजाय़ते ||
५४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विपरीतास्तदा नार्यो वञ्चय़ित्वा रहः पतीन् |
५५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासैः पशुभिरेव च ||
५५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्मिन्युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चाय़ुषः क्षय़े |
५६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अनावृष्टिर्महाराज जाय़ते वहुवार्षिकी ||
५६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि च |
५७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
प्रलय़ं यान्ति भूय़िष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते ||
५७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो दिनकरैर्दीप्तैः सप्तभिर्मनुजाधिप |
५८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पीय़ते सलिलं सर्वं समुद्रेषु सरित्सु च ||
५८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत |
५९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्वं तद्भस्मसाद्भूतं दृश्यते भरतर्षभ ||
५९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः संवर्तको वह्निर्वाय़ुना सह भारत |
६० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
लोकमाविशते पूर्वमादित्यैरुपशोषितम् ||
६० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः स पृथिवीं भित्त्वा समाविश्य रसातलम् |
६१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
देवदानवय़क्षाणां भय़ं जनय़ते महत् ||
६१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
निर्दहन्नागलोकं च यच्च किञ्चित्क्षिताविह |
६२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अधस्तात्पृथिवीपाल सर्वं नाशय़ते क्षणात् ||
६२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो योजनविंशानां सहस्राणि शतानि च |
६३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निर्दहत्यशिवो वाय़ुः स च संवर्तकोऽनलः ||
६३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सदेवासुरगन्धर्वं सय़क्षोरगराक्षसम् |
६४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो दहति दीप्तः स सर्वमेव जगद्विभुः ||
६४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो गजकुलप्रख्यास्तडिन्मालाविभूषिताः |
६५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
उत्तिष्ठन्ति महामेघा नभस्यद्भुतदर्शनाः ||
६५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
केचिन्नीलोत्पलश्यामाः केचित्कुमुदसंनिभाः |
६६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
केचित्किञ्जल्कसङ्काशाः केचित्पीताः पय़ोधराः ||
६६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
केचिद्धारिद्रसङ्काशाः काकाण्डकनिभास्तथा |
६७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
केचित्कमलपत्राभाः केचिद्धिङ्गुलकप्रभाः ||
६७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
केचित्पुरवराकाराः केचिद्गजकुलोपमाः |
६८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
केचिदञ्जनसङ्काशाः केचिन्मकरसंस्थिताः |
६८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
विद्युन्मालापिनद्धाङ्गाः समुत्तिष्ठन्ति वै घनाः ||
६८ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
घोररूपा महाराज घोरस्वननिनादिताः |
६९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो जलधराः सर्वे व्याप्नुवन्ति नभस्तलम् ||
६९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तैरिय़ं पृथिवी सर्वा सपर्वतवनाकरा |
७० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आपूर्यते महाराज सलिलौघपरिप्लुता ||
७० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्ते जलदा घोरा राविणः पुरुषर्षभ |
७१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्वतः प्लावय़न्त्याशु चोदिताः परमेष्ठिना ||
७१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
वर्षमाणा महत्तोय़ं पूरय़न्तो वसुन्धराम् |
७२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुघोरमशिवं रौद्रं नाशय़न्ति च पावकम् ||
७२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो द्वादश वर्षाणि पय़ोदास्त उपप्लवे |
७३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
धाराभिः पूरय़न्तो वै चोद्यमाना महात्मना ||
७३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः समुद्रः स्वां वेलामतिक्रामति भारत |
७४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पर्वताश्च विशीर्यन्ते मही चापि विशीर्यते ||
७४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सर्वतः सहसा भ्रान्तास्ते पय़ोदा नभस्तलम् |
७५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
संवेष्टय़ित्वा नश्यन्ति वाय़ुवेगपराहताः ||
७५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततस्तं मारुतं घोरं स्वय़म्भूर्मनुजाधिप |
७६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आदिपद्मालय़ो देवः पीत्वा स्वपिति भारत ||
७६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे |
७७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
नष्टे देवासुरगणे यक्षराक्षसवर्जिते ||
७७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
निर्मनुष्ये महीपाल निःश्वापदमहीरुहे |
७८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन्भ्रमाम्येकोऽहमादृतः ||
७८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
एकार्णवे जले घोरे विचरन्पार्थिवोत्तम |
७९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
अपश्यन्सर्वभूतानि वैक्लव्यमगमं परम् ||
७९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः सुदीर्घं गत्वा तु प्लवमानो नराधिप |
८० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्रान्तः क्वचिन्न शरणं लभाम्यहमतन्द्रितः ||
८० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः कदाचित्पश्यामि तस्मिन्सलिलसम्प्लवे |
८१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
न्यग्रोधं सुमहान्तं वै विशालं पृथिवीपते ||
८१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शाखाय़ां तस्य वृक्षस्य विस्तीर्णाय़ां नराधिप |
८२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
पर्यङ्के पृथिवीपाल दिव्यास्तरणसंस्तृते ||
८२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
उपविष्टं महाराज पूर्णेन्दुसदृशाननम् |
८३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
फुल्लपद्मविशालाक्षं वालं पश्यामि भारत ||
८३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो मे पृथिवीपाल विस्मय़ः सुमहानभूत् |
८४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
कथं त्वय़ं शिशुः शेते लोके नाशमुपागते ||
८४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
तपसा चिन्तय़ंश्चापि तं शिशुं नोपलक्षय़े |
८५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
भूतं भव्यं भविष्यच्च जानन्नपि नराधिप ||
८५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अतसीपुष्पवर्णाभः श्रीवत्सकृतलक्षणः |
८६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
साक्षाल्लक्ष्म्या इवावासः स तदा प्रतिभाति मे ||
८६ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो मामव्रवीद्वालः स पद्मनिभलोचनः |
८७ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
श्रीवत्सधारी द्युतिमान्वाक्यं श्रुतिसुखावहम् ||
८७ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
जानामि त्वा परिश्रान्तं तात विश्रामकाङ्क्षिणम् |
८८ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
मार्कण्डेय़ इहास्स्व त्वं यावदिच्छसि भार्गव ||
८८ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
अभ्यन्तरं शरीरं मे प्रविश्य मुनिसत्तम |
८९ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
आस्स्व भो विहितो वासः प्रसादस्ते कृतो मय़ा ||
८९ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो वालेन तेनैवमुक्तस्यासीत्तदा मम |
९० क
मार्कण्डेय़ उवाच:
निर्वेदो जीविते दीर्घे मनुष्यत्वे च भारत ||
९० ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततो वालेन तेनास्यं सहसा विवृतं कृतम् |
९१ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
तस्याहमवशो वक्त्रं दैवय़ोगात्प्रवेशितः ||
९१ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
ततः प्रविष्टस्तत्कुक्षिं सहसा मनुजाधिप |
९२ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सराष्ट्रनगराकीर्णां कृत्स्नां पश्यामि मेदिनीम् ||
९२ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
गङ्गां शतद्रुं सीतां च यमुनामथ कौशिकीम् |
९३ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
चर्मण्वतीं वेत्रवतीं चन्द्रभागां सरस्वतीम् ||
९३ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि |
९४ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
वस्वोकसारां नलिनीं नर्मदां चैव भारत ||
९४ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
नदीं ताम्रां च वेण्णां च पुण्यतोय़ां शुभावहाम् |
९५ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम् |
९५ ख
मार्कण्डेय़ उवाच:
शोणं च पुरुषव्याघ्र विशल्यां कम्पुनामपि ||
९५ ग
मार्कण्डेय़ उवाच:
एताश्चान्याश्च नद्योऽहं पृथिव्यां या नरोत्तम |
९६ क
मार्कण्डेय़ उवाच:
परिक्रामन्प्रपश्यामि तस्य कुक्षौ महात्मनः ||
९६ ख