chevron_left आश्रमवासिक पर्व अध्याय १४
धृतराष्ट्र उवाच:
शन्तनुः पालय़ामास यथावत्पृथिवीमिमाम् |
१ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तथा विचित्रवीर्यश्च भीष्मेण परिपालितः |
१ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
पालय़ामास वस्तातो विदितं वो नसंशय़ः ||
१ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
यथा च पाण्डुर्भ्राता मे दय़ितो भवतामभूत् |
२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
स चापि पालय़ामास यथावत्तच्च वेत्थ ह ||
२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
मय़ा च भवतां सम्यक्छुश्रूषा या कृतानघाः |
३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
असम्यग्वा महाभागास्तत्क्षन्तव्यमतन्द्रितैः ||
३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
यच्च दुर्योधनेनेदं राज्यं भुक्तमकण्टकम् |
४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अपि तत्र न वो मन्दो दुर्वुद्धिरपराद्धवान् ||
४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तस्यापराधाद्दुर्वुद्धेरभिमानान्महीक्षिताम् |
५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
विमर्दः सुमहानासीदनय़ान्मत्कृतादथ ||
५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तन्मय़ा साधु वापीदं यदि वासाधु वै कृतम् |
६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
तद्वो हृदि न कर्तव्यं मामनुज्ञातुमर्हथ ||
६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
वृद्धोऽय़ं हतपुत्रोऽय़ं दुःखितोऽय़ं जनाधिपः |
७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
पूर्वराज्ञां च पुत्रोऽय़मिति कृत्वानुजानत ||
७ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
इय़ं च कृपणा वृद्धा हतपुत्रा तपस्विनी |
८ क
धृतराष्ट्र उवाच:
गान्धारी पुत्रशोकार्ता तुल्यं याचति वो मय़ा ||
८ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
हतपुत्राविमौ वृद्धौ विदित्वा दुःखितौ तथा |
९ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अनुजानीत भद्रं वो व्रजावः शरणं च वः ||
९ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अय़ं च कौरवो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः |
१० क
धृतराष्ट्र उवाच:
सर्वैर्भवद्भिर्द्रष्टव्यः समेषु विषमेषु च |
१० ख
धृतराष्ट्र उवाच:
न जातु विषमं चैव गमिष्यति कदाचन ||
१० ग
धृतराष्ट्र उवाच:
चत्वारः सचिवा यस्य भ्रातरो विपुलौजसः |
११ क
धृतराष्ट्र उवाच:
लोकपालोपमा ह्येते सर्वे धर्मार्थदर्शिनः ||
११ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
व्रह्मेव भगवानेष सर्वभूतजगत्पतिः |
१२ क
धृतराष्ट्र उवाच:
युधिष्ठिरो महातेजा भवतः पालय़िष्यति ||
१२ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
अवश्यमेव वक्तव्यमिति कृत्वा व्रवीमि वः |
१३ क
धृतराष्ट्र उवाच:
एष न्यासो मय़ा दत्तः सर्वेषां वो युधिष्ठिरः |
१३ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भवन्तोऽस्य च वीरस्य न्यासभूता मय़ा कृताः ||
१३ ग
धृतराष्ट्र उवाच:
यद्येव तैः कृतं किञ्चिद्व्यलीकं वा सुतैर्मम |
१४ क
धृतराष्ट्र उवाच:
यद्यन्येन मदीय़ेन तदनुज्ञातुमर्हथ ||
१४ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
भवद्भिर्हि न मे मन्युः कृतपूर्वः कथञ्चन |
१५ क
धृतराष्ट्र उवाच:
अत्यन्तगुरुभक्तानामेषोऽञ्जलिरिदं नमः ||
१५ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
तेषामस्थिरवुद्धीनां लुव्धानां कामचारिणाम् |
१६ क
धृतराष्ट्र उवाच:
कृते याचामि वः सर्वान्गान्धारीसहितोऽनघाः ||
१६ ख
धृतराष्ट्र उवाच:
इत्युक्तास्तेन ते राज्ञा पौरजानपदा जनाः |
१७ क
धृतराष्ट्र उवाच:
नोचुर्वाष्पकलाः किञ्चिद्वीक्षां चक्रुः परस्परम् ||
१७ ख