भीष्म उवाच:
येन शक्यस्त्वय़ा मोक्षः प्राप्तुं श्रेय़ो यथा मय़ा ||
५० ख
भीष्म उवाच:
मय़ा ह्युपाय़ो दृष्टोऽय़ं विचार्य मतिमात्मनः |
५१ क
भीष्म उवाच:
आत्मार्थं च त्वदर्थं च श्रेय़ः साधारणं हि नौ ||
५१ ख
भीष्म उवाच:
इदं हि नकुलोलूकं पापवुद्ध्यभितः स्थितम् |
५२ क
भीष्म उवाच:
न धर्षय़ति मार्जार तेन मे स्वस्ति साम्प्रतम् ||
५२ ख
भीष्म उवाच:
कूजंश्चपलनेत्रोऽय़ं कौशिको मां निरीक्षते |
५३ क
भीष्म उवाच:
नगशाखाग्रहस्तिष्ठंस्तस्याहं भृशमुद्विजे ||
५३ ख
भीष्म उवाच:
सतां साप्तपदं सख्यं सवासो मेऽसि पण्डितः |
५४ क
भीष्म उवाच:
सांवास्यकं करिष्यामि नास्ति ते मृत्युतो भय़म् ||
५४ ख
भीष्म उवाच:
न हि शक्नोषि मार्जार पाशं छेत्तुं विना मय़ा |
५५ क
भीष्म उवाच:
अहं छेत्स्यामि ते पाशं यदि मां त्वं न हिंससि ||
५५ ख
भीष्म उवाच:
त्वमाश्रितो नगस्याग्रं मूलं त्वहमुपाश्रितः |
५६ क
भीष्म उवाच:
चिरोषिताविहावां वै वृक्षेऽस्मिन्विदितं हि ते ||
५६ ख
भीष्म उवाच:
यस्मिन्नाश्वसते कश्चिद्यश्च नाश्वसते क्वचित् |
५७ क
भीष्म उवाच:
न तौ धीराः प्रशंसन्ति नित्यमुद्विग्नचेतसौ ||
५७ ख
भीष्म उवाच:
तस्माद्विवर्धतां प्रीतिः सत्या सङ्गतिरस्तु नौ |
५८ क
भीष्म उवाच:
कालातीतमपार्थं हि न प्रशंसन्ति पण्डिताः ||
५८ ख
भीष्म उवाच:
अर्थय़ुक्तिमिमां तावद्यथाभूतां निशामय़ |
५९ क
भीष्म उवाच:
तव जीवितमिच्छामि त्वं ममेच्छसि जीवितम् ||
५९ ख
भीष्म उवाच:
कश्चित्तरति काष्ठेन सुगम्भीरां महानदीम् |
६० क
भीष्म उवाच:
स तारय़ति तत्काष्ठं स च काष्ठेन तार्यते ||
६० ख
भीष्म उवाच:
ईदृशो नौ समाय़ोगो भविष्यति सुनिस्तरः |
६१ क
भीष्म उवाच:
अहं त्वां तारय़िष्यामि त्वं च मां तारय़िष्यसि ||
६१ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्त्वा तु पलितस्तदर्थमुभय़ोर्हितम् |
६२ क
भीष्म उवाच:
हेतुमद्ग्रहणीय़ं च कालाकाङ्क्षी व्यपैक्षत ||
६२ ख
भीष्म उवाच:
अथ सुव्याहृतं तस्य श्रुत्वा शत्रुर्विचक्षणः |
६३ क
भीष्म उवाच:
हेतुमद्ग्रहणीय़ार्थं मार्जारो वाक्यमव्रवीत् ||
६३ ख
भीष्म उवाच:
वुद्धिमान्वाक्यसम्पन्नस्तद्वाक्यमनुवर्णय़न् |
६४ क
भीष्म उवाच:
तामवस्थामवेक्ष्यान्त्यां साम्नैव प्रत्यपूजय़त् ||
६४ ख
भीष्म उवाच:
ततस्तीक्ष्णाग्रदशनो वैडूर्यमणिलोचनः |
६५ क
भीष्म उवाच:
मूषकं मन्दमुद्वीक्ष्य मार्जारो लोमशोऽव्रवीत् ||
६५ ख
भीष्म उवाच:
नन्दामि सौम्य भद्रं ते यो मां जीवन्तमिच्छसि |
६६ क
भीष्म उवाच:
श्रेय़श्च यदि जानीषे क्रिय़तां मा विचारय़ ||
६६ ख
भीष्म उवाच:
अहं हि दृढमापन्नस्त्वमापन्नतरो मय़ा |
६७ क
भीष्म उवाच:
द्वय़ोरापन्नय़ोः सन्धिः क्रिय़तां मा विचारय़ ||
६७ ख
भीष्म उवाच:
विधत्स्व प्राप्तकालं यत्कार्यं सिध्यतु चावय़ोः |
६८ क
भीष्म उवाच:
मय़ि कृच्छ्राद्विनिर्मुक्ते न विनङ्क्ष्यति ते कृतम् ||
६८ ख
भीष्म उवाच:
न्यस्तमानोऽस्मि भक्तोऽस्मि शिष्यस्त्वद्धितकृत्तथा |
६९ क
भीष्म उवाच:
निदेशवशवर्ती च भवन्तं शरणं गतः ||
६९ ख
भीष्म उवाच:
इत्येवमुक्तः पलितो मार्जारं वशमागतम् |
७० क
भीष्म उवाच:
वाक्यं हितमुवाचेदमभिनीतार्थमर्थवत् ||
७० ख
भीष्म उवाच:
उदारं यद्भवानाह नैतच्चित्रं भवद्विधे |
७१ क
भीष्म उवाच:
विदितो यस्तु मार्गो मे हितार्थं शृणु तं मम ||
७१ ख
भीष्म उवाच:
अहं त्वानुप्रवेक्ष्यामि नकुलान्मे महद्भय़म् |
७२ क
भीष्म उवाच:
त्राय़स्व मां मा वधीश्च शक्तोऽस्मि तव मोक्षणे ||
७२ ख
भीष्म उवाच:
उलूकाच्चैव मां रक्ष क्षुद्रः प्रार्थय़ते हि माम् |
७३ क
भीष्म उवाच:
अहं छेत्स्यामि ते पाशान्सखे सत्येन ते शपे ||
७३ ख
भीष्म उवाच:
तद्वचः सङ्गतं श्रुत्वा लोमशो युक्तमर्थवत् |
७४ क
भीष्म उवाच:
हर्षादुद्वीक्ष्य पलितं स्वागतेनाभ्यपूजय़त् ||
७४ ख
भीष्म उवाच:
स तं सम्पूज्य पलितं मार्जारः सौहृदे स्थितः |
७५ क
भीष्म उवाच:
सुविचिन्त्याव्रवीद्धीरः प्रीतस्त्वरित एव हि ||
७५ ख
भीष्म उवाच:
क्षिप्रमागच्छ भद्रं ते त्वं मे प्राणसमः सखा |
७६ क
भीष्म उवाच:
तव प्राज्ञ प्रसादाद्धि क्षिप्रं प्राप्स्यामि जीवितम् ||
७६ ख
भीष्म उवाच:
यद्यदेवङ्गतेनाद्य शक्यं कर्तुं मय़ा तव |
७७ क
भीष्म उवाच:
तदाज्ञापय़ कर्ताहं सन्धिरेवास्तु नौ सखे ||
७७ ख
भीष्म उवाच:
अस्मात्ते संशय़ान्मुक्तः समित्रगणवान्धवः |
७८ क
भीष्म उवाच:
सर्वकार्याणि कर्ताहं प्रिय़ाणि च हितानि च ||
७८ ख
भीष्म उवाच:
मुक्तश्च व्यसनादस्मात्सौम्याहमपि नाम ते |
७९ क
भीष्म उवाच:
प्रीतिमुत्पादय़ेय़ं च प्रतिकर्तुं च शक्नुय़ाम् ||
७९ ख
भीष्म उवाच:
ग्राहय़ित्वा तु तं स्वार्थं मार्जारं मूषकस्तदा |
८० क
भीष्म उवाच:
प्रविवेश सुविस्रव्धः सम्यगर्थांश्चचार ह ||
८० ख
भीष्म उवाच:
एवमाश्वासितो विद्वान्मार्जारेण स मूषकः |
८१ क
भीष्म उवाच:
मार्जारोरसि विस्रव्धः सुष्वाप पितृमातृवत् ||
८१ ख
भीष्म उवाच:
लीनं तु तस्य गात्रेषु मार्जारस्याथ मूषकम् |
८२ क
भीष्म उवाच:
तौ दृष्ट्वा नकुलोलूकौ निराशौ जग्मतुर्गृहान् ||
८२ ख
भीष्म उवाच:
लीनस्तु तस्य गात्रेषु पलितो देशकालवित् |
८३ क
भीष्म उवाच:
चिच्छेद पाशान्नृपते कालाकाङ्क्षी शनैः शनैः ||
८३ ख
भीष्म उवाच:
अथ वन्धपरिक्लिष्टो मार्जारो वीक्ष्य मूषकम् |
८४ क
भीष्म उवाच:
छिन्दन्तं वै तदा पाशानत्वरन्तं त्वरान्वितः ||
८४ ख
भीष्म उवाच:
तमत्वरन्तं पलितं पाशानां छेदने तदा |
८५ क
भीष्म उवाच:
सञ्चोदय़ितुमारेभे मार्जारो मूषकं तदा ||
८५ ख
भीष्म उवाच:
किं सौम्य नाभित्वरसे किं कृतार्थोऽवमन्यसे |
८६ क
भीष्म उवाच:
छिन्धि पाशानमित्रघ्न पुरा श्वपच एति सः ||
८६ ख
भीष्म उवाच:
इत्युक्तस्त्वरता तेन मतिमान्पलितोऽव्रवीत् |
८७ क
भीष्म उवाच:
मार्जारमकृतप्रज्ञं वश्यमात्महितं वचः ||
८७ ख
भीष्म उवाच:
तूष्णीं भव न ते सौम्य त्वरा कार्या न सम्भ्रमः |
८८ क
भीष्म उवाच:
वय़मेवात्र कालज्ञा न कालः परिहास्यते ||
८८ ख
भीष्म उवाच:
अकाले कृत्यमारव्धं कर्तुं नार्थाय़ कल्पते |
८९ क
भीष्म उवाच:
तदेव काल आरव्धं महतेऽर्थाय़ कल्पते ||
८९ ख
भीष्म उवाच:
अकालविप्रमुक्तान्मे त्वत्त एव भय़ं भवेत् |
९० क
भीष्म उवाच:
तस्मात्कालं प्रतीक्षस्व किमिति त्वरसे सखे ||
९० ख
भीष्म उवाच:
यावत्पश्यामि चण्डालमाय़ान्तं शस्त्रपाणिनम् |
९१ क
भीष्म उवाच:
ततश्छेत्स्यामि ते पाशं प्राप्ते साधारणे भय़े ||
९१ ख
भीष्म उवाच:
तस्मिन्काले प्रमुक्तस्त्वं तरुमेवाधिरोहसि |
९२ क
भीष्म उवाच:
न हि ते जीवितादन्यत्किञ्चित्कृत्यं भविष्यति ||
९२ ख
भीष्म उवाच:
ततो भवत्यतिक्रान्ते त्रस्ते भीते च लोमश |
९३ क
भीष्म उवाच:
अहं विलं प्रवेक्ष्यामि भवाञ्शाखां गमिष्यति ||
९३ ख
भीष्म उवाच:
एवमुक्तस्तु मार्जारो मूषकेणात्मनो हितम् |
९४ क
भीष्म उवाच:
वचनं वाक्यतत्त्वज्ञो जीवितार्थी महामतिः ||
९४ ख
भीष्म उवाच:
अथात्मकृत्यत्वरितः सम्यक्प्रश्रय़माचरन् |
९५ क
भीष्म उवाच:
उवाच लोमशो वाक्यं मूषकं चिरकारिणम् ||
९५ ख
भीष्म उवाच:
न ह्येवं मित्रकार्याणि प्रीत्या कुर्वन्ति साधवः |
९६ क
भीष्म उवाच:
यथा त्वं मोक्षितः कृच्छ्रात्त्वरमाणेन वै मय़ा ||
९६ ख
भीष्म उवाच:
तथैव त्वरमाणेन त्वय़ा कार्यं हितं मम |
९७ क
भीष्म उवाच:
यत्नं कुरु महाप्राज्ञ यथा स्वस्त्यावय़ोर्भवेत् ||
९७ ख
भीष्म उवाच:
अथ वा पूर्ववैरं त्वं स्मरन्कालं विकर्षसि |
९८ क
भीष्म उवाच:
पश्य दुष्कृतकर्मत्वं व्यक्तमाय़ुःक्षय़ो मम ||
९८ ख
भीष्म उवाच:
यच्च किञ्चिन्मय़ाज्ञानात्पुरस्ताद्विप्रिय़ं कृतम् |
९९ क
भीष्म उवाच:
न तन्मनसि कर्तव्यं क्षमय़े त्वां प्रसीद मे ||
९९ ख
भीष्म उवाच:
तमेवंवादिनं प्राज्ञः शास्त्रविद्वुद्धिसंमतः |
१०० क