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द्रोण पर्व
अध्याय ९८
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सञ्जय़ उवाच
प्रविश्य च रणे द्रोणः पाञ्चालानां वरूथिनीम् |  २५   क
द्रावय़ामास योधान्वै शतशोऽथ सहस्रशः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति