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वन पर्व
अध्याय ९७
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अगस्त्य उवाच
मह्यं ततो वै द्विगुणं रथश्चैव हिरण्मय़ः |  १३   क
मनोजवौ वाजिनौ च दित्सितं ते महासुर |  १३   ख
जिज्ञास्यतां रथः सद्यो व्यक्तमेष हिरण्मय़ः ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति