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अनुशासन पर्व
अध्याय ९६
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दिलीप उवाच
उदपानप्लवे ग्रामे व्राह्मणो वृषलीपतिः |  २३   क
तस्य लोकान्स व्रजतु यस्ते हरति पुष्करम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति