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द्रोण पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
ते हन्यमाना वीरेण म्लेच्छाः सात्यकिना रणे |  ३६   क
शतशो न्यपतंस्तत्र व्यसवो वसुधातले ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति