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भीष्म पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
महान्त्यनीकानि महासमुच्छ्रय़े; समागमे पाण्डवधार्तराष्ट्रय़ोः |  ५२   क
प्रकाशिरे शङ्खमृदङ्गनिस्वनैः; प्रकम्पितानीव वनानि वाय़ुना ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति