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भीष्म पर्व
अध्याय ९५
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सञ्जय़ उवाच
भीष्मं तु रथवंशेन दृष्ट्वा तमभिसंवृतम् |  २४   क
अर्जुनो रथिनां श्रेष्ठो धृष्टद्युम्नमुवाच ह ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति