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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९५
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वैशम्पाय़न उवाच
वृत्ते शुद्धे स्थिता नित्यमिन्द्रिय़ैश्चाप्यवाहिताः |  ९   क
उपासते स्म तं यज्ञं भुञ्जानास्ते महर्षय़ः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति