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वन पर्व
अध्याय ९१
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वैशम्पाय़न उवाच
भरतस्य च वीरस्य सार्वभौमस्य पार्थिव |  ९   क
ध्रुवं प्राप्स्यसि दुष्प्रापाँल्लोकांस्तीर्थपरिप्लुतः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति