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शल्य पर्व
अध्याय ९
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सञ्जय़ उवाच
स शत्रुभुजनिर्मुक्तैर्ललाटस्थैस्त्रिभिः शरैः |  १५   क
नकुलः शुशुभे राजंस्त्रिशृङ्ग इव पर्वतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति