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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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इन्द्र उवाच
प्रव्राजय़ेय़ं कालकेय़ान्पृथिव्या; मपाकर्षं दानवानन्तरिक्षात् |  ३०   क
दिवः प्रह्रादमवसानमानय़ं; को मेऽसुखाय़ प्रहरेत मर्त्यः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति