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शान्ति पर्व
अध्याय ९
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युधिष्ठिर उवाच
सार्थगम्यमहं मार्गं न जातु त्वत्कृते पुनः |  २   क
गच्छेय़ं तद्गमिष्यामि हित्वा ग्राम्यसुखान्युत ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति