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वन पर्व
अध्याय ८९
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वैशम्पाय़न उवाच
सञ्चरन्नस्मि कौन्तेय़ सर्वलोकान्यदृच्छय़ा |  ५   क
गतः शक्रस्य सदनं तत्रापश्यं सुरेश्वरम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति