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द्रोण पर्व
अध्याय ८५
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सञ्जय़ उवाच
नैतद्वलमसंवार्य शक्यो हन्तुं जय़द्रथः |  ७४   क
एते हि सैन्धवस्यार्थे सर्वे सन्त्यक्तजीविताः ||  ७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति