अनुशासन पर्व  अध्याय ८५

अग्निरु उवाच

कविः काव्यश्च विष्णुश्च वुद्धिमानुशनास्तथा |  ४१   क
भृगुश्च विरजाश्चैव काशी चोग्रश्च धर्मवित् ||  ४१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति