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शान्ति पर्व
अध्याय ८५
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वृहस्पतिरु उवाच
यो हि नाभाषते किञ्चित्सततं भ्रुकुटीमुखः |  ५   क
द्वेष्यो भवति भूतानां स सान्त्वमिह नाचरन् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति