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आदि पर्व
अध्याय ८५
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अष्टक उवाच
शरीरदेहादिसमुच्छ्रय़ं च; चक्षुःश्रोत्रे लभते केन सञ्ज्ञाम् |  १३   क
एतत्तत्त्वं सर्वमाचक्ष्व पृष्टः; क्षेत्रज्ञं त्वां तात मन्याम सर्वे ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति