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द्रोण पर्व
अध्याय ८४
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सञ्जय़ उवाच
वललाघवसम्पन्नः सम्पन्नो विक्रमेण च |  २३   क
भैमसेनी रणे क्रुद्धः सर्वसैन्यान्यभीषय़त् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति