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आदि पर्व
अध्याय ८४
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यय़ातिरु उवाच
ततः पुरीं पुरुहूतस्य रम्यां; सहस्रद्वारां शतय़ोजनाय़ताम् |  १४   क
अध्यावसं वर्षसहस्रमात्रं; ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति