वन पर्व  अध्याय ८२

पुलस्त्य उवाच

ततो गय़ां समासाद्य व्रह्मचारी जितेन्द्रिय़ः |  ७१   क
अश्वमेधमवाप्नोति गमनादेव भारत ||  ७१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति