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वन पर्व
अध्याय ८२
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पुलस्त्य उवाच
शतसाहस्रिकं तत्र तीर्थं भरतसत्तम |  ६७   क
तत्रोपस्पर्शनं कृत्वा निय़तो निय़ताशनः |  ६७   ख
गोसहस्रफलं पुण्यं प्राप्नोति भरतर्षभ ||  ६७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति