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शान्ति पर्व
अध्याय ८२
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नारद उवाच
नान्यत्र वुद्धिक्षान्तिभ्यां नान्यत्रेन्द्रिय़निग्रहात् |  २६   क
नान्यत्र धनसन्त्यागाद्गणः प्राज्ञेऽवतिष्ठते ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति