वन पर्व  अध्याय ८१

पुलस्त्य उवाच

स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टो महातपाः |  ९९   क
प्रनृत्तः किल विप्रर्षिर्विस्मय़ोत्फुल्ललोचनः ||  ९९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति