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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
कौशिक्याः सङ्गमे यस्तु दृषद्वत्याश्च भारत |  ८०   क
स्नाति वै निय़ताहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति