वन पर्व  अध्याय ८१

पुलस्त्य उवाच

एकरात्रं समासाद्य एकरात्रोषितो नरः |  १५९   क
निय़तः सत्यवादी च व्रह्मलोके महीय़ते ||  १५९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति