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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
मधुस्रवं च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम |  १३०   क
तत्र स्नात्वा नरो राजन्गोसहस्रफलं लभेत् ||  १३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति