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द्रोण पर्व
अध्याय ८०
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सञ्जय़ उवाच
स यूपः काञ्चनो राजन्सौमदत्तेर्विराजते |  २३   क
राजसूय़े मखश्रेष्ठे यथा यूपः समुच्छ्रितः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति