वन पर्व  अध्याय ८

वैशम्पाय़न उवाच

एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा |  १३   क
नातिहृष्टमनाः क्षिप्रमभवत्स पराङ्मुखः ||  १३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति