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सौप्तिक पर्व
अध्याय ८
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सञ्जय़ उवाच
निशाचराणां सत्त्वानां स रात्रिर्हर्षवर्धिनी |  १२६   क
आसीन्नरगजाश्वानां रौद्री क्षय़करी भृशम् ||  १२६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति