वन पर्व  अध्याय ७४

वृहदश्व उवाच

विमुच्य मां गतः पापः स ततोऽहमिहागतः |  २०   क
त्वदर्थं विपुलश्रोणि न हि मेऽन्यत्प्रय़ोजनम् ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति