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उद्योग पर्व
अध्याय ७३
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वैशम्पाय़न उवाच
उद्वेपते ते हृदय़ं मनस्ते प्रविषीदति |  १८   क
ऊरुस्तम्भगृहीतोऽसि तस्मात्प्रशममिच्छसि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति