उद्योग पर्व  अध्याय ७१

भगवानु उवाच

न हि कार्पण्यमास्थाय़ शक्या वृत्तिर्युधिष्ठिर |  ५   क
विक्रमस्व महावाहो जहि शत्रूनरिन्दम ||  ५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति