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द्रोण पर्व
अध्याय ७०
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सञ्जय़ उवाच
मृद्नतस्तान्यनीकानि निघ्नतश्चापि साय़कैः |  २८   क
वभूव रूपं द्रोणस्य कालाग्नेरिव दीप्यतः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति