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शान्ति पर्व
अध्याय ७०
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भीष्म उवाच
भवेत्कृतय़ुगे धर्मो नाधर्मो विद्यते क्वचित् |  ८   क
सर्वेषामेव वर्णानां नाधर्मे रमते मनः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति