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भीष्म पर्व
अध्याय ७
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वैशम्पाय़न उवाच
अचिन्त्या दिव्यसङ्कल्पा प्रभोरेषैव संविधिः |  ४६   क
उपासते यत्र सत्रं सहस्रय़ुगपर्यये ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति